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वैश्विक उथल-पुथल और भारत की बदलती स्थिति

कुछ महीने पहले तक वैश्विक आर्थिक मंच पर भारत की स्थिति अत्यंत सुदृढ़ दिखाई दे रही थी। भारतीय अर्थव्यवस्था अपनी निरंतर विकास दर के दम पर जापान को पछाड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दहलीज पर खड़ी थी। यह न केवल एक सांख्यिकीय उपलब्धि होती, बल्कि भारत के बढ़ते वैश्विक प्रभाव और आर्थिक मजबूती का एक प्रतीकात्मक मील का पत्थर भी साबित होती।

लेकिन, हालिया बाहरी झटकों ने इस उत्साह और उम्मीदों को एक बड़ा झटका दिया है। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच अचानक बढ़े तनाव और शत्रुता ने वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल ला दिया है। इस भू-राजनीतिक अस्थिरता ने एक बार फिर भारतीय अर्थव्यवस्था की उन बुनियादी कमजोरियों को उजागर कर दिया है, जो दशकों से इसकी राह में रोड़ा बनी हुई हैं।

भारत की सबसे बड़ी संरचनात्मक संवेदनशीलता उसकी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए विदेशी आयात पर अत्यधिक निर्भरता है। इसके अलावा, भारतीय बाजार विदेशी संस्थागत निवेशकों के निवेश और प्रवासियों द्वारा भेजे जाने वाले धन (रेमिटेंस) पर भी काफी हद तक निर्भर हैं। जब भी वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, भारत का चालू खाता घाटा अधिक हो जाता है।

वर्तमान संकट में भी यही देखने को मिला है। वैश्विक अनिश्चितता के इस माहौल में विदेशी संस्थागत निवेशकों ने भारत जैसे उभरते बाजारों से अपना पैसा निकालना शुरू कर दिया और सुरक्षित निवेश की ओर रुख किया। इन दोहरे झटकों—बढ़ता आयात बिल और घटता विदेशी निवेश—ने भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव डाला है।

इस आर्थिक दबाव का सबसे प्रत्यक्ष और कड़वा प्रभाव भारतीय रुपये पर पड़ा है। रुपया डॉलर के मुकाबले अपने ऐतिहासिक निचले स्तर 95 तक गिर गया। रुपये की इस कमजोरी ने डॉलर के संदर्भ में भारतीय अर्थव्यवस्था के कुल मूल्यांकन को काफी कम कर दिया है। इसी मुद्रा अवमूल्यन के कारण भारत वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं की रैंकिंग में फिसलकर छठे स्थान पर आ गया है, और यूनाइटेड किंगडम एक बार फिर भारत से आगे निकल गया है।

ताजा अनुमानों के अनुसार, वर्ष 2026-27 के लिए भारत की जीडीपी लगभग 4.15 ट्रिलियन डॉलर रहने का अनुमान है। इस रैंकिंग में अब भारत, अमेरिका, चीन, जर्मनी, जापान और यूनाइटेड किंगडम के बाद छठे स्थान पर है। हालांकि, अर्थशास्त्रियों का मानना है कि अर्थव्यवस्थाओं का यह क्रम वास्तविक अर्थव्यवस्था के लिए बहुत अधिक मायने नहीं रखता, क्योंकि यह मुख्य रूप से मुद्रा की विनिमय दरों पर आधारित होता है।

फिर भी, एक देश के रूप में यह राष्ट्रीय गौरव और धारणा को प्रभावित करता है। इतिहास खुद को दोहराता हुआ प्रतीत हो रहा है। साल 2016 में जब ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटिश पाउंड कमजोर हुआ था, तब भारत ने ब्रिटेन को पीछे छोड़कर दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का खिताब हासिल किया था।

आज स्थिति उलट गई है; मुद्रा के मूल्यांकन के खेल ने ब्रिटेन को फिर से आगे कर दिया है। इन तमाम चुनौतियों और रैंकिंग में आई गिरावट के बावजूद, भारत की बुनियादी आर्थिक विकास की कहानी अभी खत्म नहीं हुई है। भारत आज भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में से एक बना हुआ है। 6-7 प्रतिशत की अनुमानित विकास दर के साथ, भारत का लक्ष्य अभी भी 2028 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का है।

लेकिन यहाँ एक गंभीर चेतावनी भी छिपी है। भारत की कोई भी आर्थिक वृद्धि तब तक नाजुक और अस्थिर बनी रहेगी, जब तक वह विदेशी कच्चे तेल पर निर्भर है। जब भी अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ेंगी, भारत की विकास दर और राजकोषीय स्थिति खतरे में पड़ जाएगी। वर्तमान संकट भारत सरकार के लिए एक स्पष्ट चेतावनी है। यदि भारत को एक स्थायी महाशक्ति बनना है, तो उसे आयातित कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता को न्यूनतम करना होगा।

सरकार को नई तकनीकों, जैसे हरित ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, हाइड्रोजन ईंधन और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों को अपनाने की गति को तेज करना चाहिए। ऊर्जा सुरक्षा ही वास्तविक आर्थिक सुरक्षा है। यदि भारत ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ता है, तभी वह भविष्य में बाहरी झटकों को सहने और वैश्विक रैंकिंग में अपनी स्थायी जगह बनाने में सक्षम हो पाएगा।

जाहिर सी बात है कि सिर्फ बड़बोलेपन से यह सफलता हासिल नहीं होगी क्योंकि दुनिया का हर देश अपने अपने स्तर पर खुद को आगे ले जाने की कोशिशों में जुटा है। यथास्थितिवाद से देश में जो जड़ता आ गयी है उसे बदलने की जरूरत है। इसके लिए भारत को अपना हर स्तर का उत्पादन सुधारना होगा ताकि देश के भीतर ही रुपये का प्रवाह तेज हो। इसके बिना सारी बातें बयानबाजी बनकर रह जाएगी।