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गोड्डा की ताम्र निधियां अब म्युजियम पहुंची

झारखंड की प्राचीन सभ्यता का वैश्विक प्रमाण

  • यहां उस काल की उन्नत आबादी थी

  •  हड़प्पा सभ्यता के अंतिम चरण का दौर

  • झारखंड में पहले भी मिले हैं प्रमाण

राष्ट्रीय खबर

रांचीः झारखंड के ऐतिहासिक गौरव को नई पहचान देते हुए गोड्डा जिले के पत्थरगामा (कस्तूरिया ग्राम) से प्राप्त ताम्र निधियां वर्तमान में पुरातत्वविदों और इतिहासकारों के बीच शोध का मुख्य विषय बनी हुई हैं। विश्व धरोहर दिवस के उपलक्ष्य में उजागर हुई यह खोज झारखंड को आदिम युग से निकालकर एक उन्नत और तकनीकी रूप से समृद्ध सभ्यता के रूप में स्थापित करती है।

आमतौर पर झारखंड के इतिहास को वनों और जनजातीय समुदायों तक सीमित मान लिया जाता है, लेकिन कस्तूरिया ग्राम में तालाब की खुदाई के दौरान मिले ये अवशेष एक अलग ही कहानी बयां करते हैं। लगभग 2000 ईसा पूर्व के ये तांबे के औजार और वस्तुएं इस बात का जीवंत प्रमाण हैं कि ताम्र-पाषाण युग में यहां के निवासी धातुकर्म की उन्नत कला में निपुण थे। यह खोज प्रमाणित करती है कि झारखंड के पूर्वज तांबे को गलाने, उसे शुद्ध करने और उससे जटिल उपकरण बनाने की कला से भली-भांति परिचित थे।

इतिहासकारों के अनुसार, ये ताम्र निधियां सिंधु घाटी सभ्यता (हड़प्पा) के अवसान और वैदिक संस्कृति के उदय के बीच के उस अंधकारमय कालखंड पर रोशनी डालती हैं, जिसके बारे में लिखित साक्ष्य बहुत कम मिलते हैं। विशेषज्ञों का मत है कि सिंधु-सरस्वती सभ्यता के लोग अपने विशाल निर्माणों और उपकरणों के लिए तांबे का आयात मुख्य रूप से झारखंड के सिंहभूम क्षेत्र से करते थे। गोड्डा में मिली ये वस्तुएं संकेत देती हैं कि गंगा की सहायक नदियों के माध्यम से झारखंड का संपर्क उस समय की अन्य महान सभ्यताओं से था।

ताम्र-निधि संस्कृति उत्तर भारत की एक ऐसी पहेली है जिसने हमेशा शोधकर्ताओं को रोमांचित किया है। हालांकि इसके अवशेष गंगा-यमुना दोआब में भी मिलते हैं, लेकिन झारखंड के हजारीबाग, गिरिडीह और रांची (बरटोली, बिखना) में इसकी सघन मौजूदगी यह सिद्ध करती है कि छोटानागपुर का पठार इस संस्कृति का मुख्य उत्पादन केंद्र या पावर हाउस था।

वर्तमान में पत्थरगामा थाने की सुरक्षा में रखी गई इन निधियों को जल्द ही रांची के होटवार स्थित राज्य संग्रहालय में स्थानांतरित किया जाएगा। यहाँ इन्हें वैज्ञानिक रूप से संरक्षित कर आम जनता और शोधार्थियों के लिए प्रदर्शित किया जाएगा। यह खोज न केवल झारखंड के पर्यटन को बढ़ावा देगी, बल्कि यह भी स्थापित करेगी कि विश्व की महान सभ्यताओं के निर्माण में झारखंड के संसाधनों और कौशल का कितना बड़ा योगदान था।