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एक चेहरे पे कई चेहरे लगा लेते हैं.. .. .. .. ..

लोकसभा में परिसीमन और महिला आरक्षण विधेयक पर हुई बहस किसी ऐतिहासिक प्रहसन से कम नहीं थी। सदन में पक्ष-विपक्ष के बीच तीखी बहस, रहस्यमयी पहेलियां और हास्यास्पद तर्क-वितर्क ने इस गंभीर विषय को एक मनोरंजक तमाशे में बदल दिया। बहस की शुरुआत गृह मंत्री अमित शाह के एक वैज्ञानिक तर्क से हुई।

उन्होंने दावा किया कि मतदाताओं और सांसदों के अनुपात में जो असंतुलन है, उसे केवल परिसीमन के माध्यम से ही ठीक किया जा सकता है। उन्होंने एक जटिल गणितीय सूत्र पेश किया, जिसे समझने में सदन के आधे से अधिक सांसदों को कठिनाई हुई। कुछ सांसद तो इस सूत्र को समझने के लिए अपने कैलकुलेटर निकालने की कोशिश करते नजर आए। अमित शाह ने यह भी दावा किया कि परिसीमन से देश का चुनावी मानचित्र अधिक संतुलित हो जाएगा, जैसे कि कोई चुनावी कार्टोग्राफर देश के नक्शे को फिर से रंग रहा हो।

विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने इस वैज्ञानिक तर्क का जवाब एक रहस्यमयी पहेली से दिया। उन्होंने अपने भाषण के अंत में अचानक 16 अंक का जिक्र किया और कहा कि इस पहेली का पूरा उत्तर नंबर 16 में छिपा है। उन्होंने सदन के सदस्यों और देश की जनता को इस पहेली को हल करने की चुनौती दी। उनके इस बयान ने सदन में भ्रम और जिज्ञासा का माहौल पैदा कर दिया। कुछ सांसद तो इस पहेली को हल करने के लिए अपने मोबाइल फोन पर गूगल करने लगे। कांग्रेस पार्टी ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर एक वीडियो साझा करके इस पहेली को हल करने की कोशिश की, जिसमें संकेत दिया गया कि 16 अंक विवादित अपराधी जेफ्री एपस्टीन से संबंधित हो सकता है। इस संकेत ने पहेली को और भी रहस्यमयी बना दिया।

बहस में महिलाओं के आरक्षण के मुद्दे पर भी दिलचस्प चर्चा हुई। कुछ पुरुष सांसदों ने महिला आरक्षण का समर्थन करते हुए कहा कि महिलाएं देश की आधी आबादी हैं और उन्हें प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह नहीं बताया कि वे महिला आरक्षण के लिए अपनी सीटें छोड़ने के लिए तैयार हैं या नहीं। एक महिला सांसद ने इस पर व्यंग्य करते हुए कहा कि पुरुष सांसद महिला आरक्षण का समर्थन तो करते हैं, लेकिन जब अपनी सीटें छोड़ने की बात आती है, तो वे अचानक गंभीर हो जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि महिला आरक्षण केवल महिलाओं के लिए नहीं, बल्कि पुरुषों के लिए भी फायदेमंद है, क्योंकि इससे सदन में शांति और अनुशासन बना रहेगा।

इसी बात पर फिल्म दाग का एक गीत याद आ रहा है। इस गीत को लिखा था साहिर लुधियानवी ने और संगीत में ढाला था लक्ष्मीकांत प्यारेलाल ने।

जब भी जी चाहे नई दुनिया बसा लेते हैं लोग

एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं लोग

याद रहता है किसे गुज़रे ज़माने का चलन

सर्द पड़ जाती है चाहत हार जाती है लगन

अब मोहब्बत भी है क्या

इक तिजारत के सिवा

हम ही नादाँ थे जो ओढ़ा बीती यादों का कफ़न

वर्ना जीने के लिए सब कुछ भुला देते हैं लोग

जाने वो क्या लोग थे जिन को वफ़ा का पास था

दूसरे के दिल पे क्या गुज़रेगी ये एहसास था

अब हैं पत्थर के सनम

जिन को एहसास न ग़म

वो ज़माना अब कहाँ जो अहल-ए-दिल को रास था

अब तो मतलब के लिए नाम-ए-वफ़ा लेते हैं लोग

एक चेहरे पर कई चेहरे लगा लेते हैं लोग

परिसीमन के मुद्दे पर भी कुछ विरोधी तर्क दिए गए। एक सांसद ने दावा किया कि परिसीमन से देश के चुनावी मानचित्र को बदलने का एक अनैतिक प्रयास किया जा रहा है, जिससे दक्षिण भारतीय राज्यों, पूर्वोत्तर के राज्यों और अन्य छोटे राज्यों का प्रतिनिधित्व कम हो जाएगा। उन्होंने इसे राष्ट्रविरोधी कृत्य करार दिया। उन्होंने यह भी दावा किया कि परिसीमन से देश का विभाजन हो जाएगा, जैसे कि चुनावी नक्शे को फिर से रंगने से देश के टुकड़े हो जाएंगे।

इस ऐतिहासिक प्रहसन में सदन की कार्यवाही भी दिलचस्प रही। स्पीकर को बार-बार सदन के सदस्यों को शांत रहने और अनुशासन बनाए रखने के लिए कहना पड़ा। कुछ सांसद तो सदन में सोते हुए नजर आए, जबकि कुछ सांसद मोबाइल फोन पर गेम खेलते हुए पकड़े गए। दर्शक गैलरी में बैठे लोग इस तमाशे को उत्सुकता से देख रहे थे, जैसे कि वे किसी कॉमेडी शो का आनंद ले रहे हों।

कुल मिलाकर, लोकसभा में परिसीमन और महिला आरक्षण विधेयक पर हुई बहस ने एक गंभीर विषय को एक मनोरंजक तमाशे में बदल दिया। यह बहस साबित करती है कि राजनीति में भी हास्य और व्यंग्य का एक महत्वपूर्ण स्थान है, और कभी-कभी गंभीर विषयों को भी एक ऐतिहासिक प्रहसन में बदला जा सकता है।