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44 सीटों पर हटाए गए मतदाता जीत के अंतर से अधिक

पश्चिम बंगाल के आंकड़े हर रोज नई कहानी बता रहे हैं

  • यह समीकरणों को बदलने वाला है

  • चुनाव आयोग पर लगे हैं गंभीर आरोप

  • दिनहाटा में पोस्टल बैलेट से जीती थी भाजपा

राष्ट्रीय खबर

कोलकाता: पश्चिम बंगाल में आगामी दो चरणों वाले विधानसभा चुनावों की तैयारियां अपने अंतिम चरण में हैं। भारत निर्वाचन आयोग द्वारा हाल ही में अंतिम रूप दी गई मतदाता सूची ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में एक नई बहस छेड़ दी है। वीनतम आंकड़ों का विश्लेषण करने पर यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि राज्य की लगभग 15 प्रतिशत विधानसभा सीटों (कुल 44 सीटें) पर हटाए गए मतदाताओं की संख्या, पिछले चुनाव में उन सीटों पर हार-जीत के अंतर से काफी अधिक है।

यह पूरी प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट की प्रत्यक्ष निगरानी में संपन्न हुई है। न्यायनिर्णयन प्रक्रिया के माध्यम से मतदाता सूची का शुद्धिकरण किया गया है, जिसका उद्देश्य दोहरे पंजीकरण, अपात्र मतदाताओं और फर्जी प्रविष्टियों को हटाना था। आयोग के आंकड़ों के अनुसार, इन 44 निर्वाचन क्षेत्रों में सूची से हटाए गए नामों की संख्या इतनी प्रभावी है कि वे आगामी चुनाव के परिणामों को पूरी तरह पलटने या प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं।

यद्यपि पश्चिम बंगाल विधानसभा में कुल 294 सीटें हैं, लेकिन इस सांख्यिकीय विश्लेषण में केवल 293 सीटों को ही आधार बनाया गया है। इसमें कूचबिहार जिले की दिनहाटा सीट को शामिल नहीं किया गया है। इसका तकनीकी कारण यह है कि 2021 के विधानसभा चुनाव में दिनहाटा सीट पर भाजपा ने पोस्टल बैलेट के माध्यम से जीत दर्ज की थी, जबकि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन की गणना में वह तृणमूल कांग्रेस से पीछे थी। चूंकि निर्वाचन आयोग का वर्तमान डेटा मुख्य रूप से ईवीएम मतदाताओं और उनकी सूची में हुए बदलावों पर केंद्रित है, इसलिए सटीक तुलना के लिए दिनहाटा को इस अध्ययन से बाहर रखा गया है।

जिन सीटों पर 2021 में हार-जीत का अंतर बेहद मामूली था (जैसे 500 से 2000 वोटों के बीच), वहां 5000 से अधिक मतदाताओं का नाम हटाया जाना सीधे तौर पर समीकरण बदल सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हटाए गए मतदाताओं का यह साइलेंट फैक्टर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए चिंता का विषय है। जहां विपक्ष इसे मतदाता सूची को पारदर्शी बनाने की दिशा में एक बड़ा कदम मान रहा है, वहीं कुछ दल इस पर अपनी आपत्ति भी दर्ज करा सकते हैं।

निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि यह प्रक्रिया पूरी तरह से पारदर्शी, निष्पक्ष और कानूनी मानकों के अनुरूप रही है। आयोग का प्राथमिक लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि केवल वास्तविक और पात्र मतदाता ही अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें, जिससे चुनावी प्रक्रिया की अखंडता और लोकतंत्र की गरिमा बनी रहे।