इजरायली हमले में 182 लोग मारे गये
एजेंसियां
बेरूतः लेबनान और इजरायल के बीच जारी संघर्ष ने बुधवार को एक अत्यंत विनाशकारी रूप ले लिया। लेबनान के स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, इजरायली वायुसेना के भीषण हमलों में मरने वालों की संख्या बढ़कर 182 हो गई है, जबकि घायलों का आंकड़ा सैकड़ों में पहुंच चुका है। यह आंकड़ा पिछले एक महीने से चल रहे इस युद्ध में किसी भी एक दिन में होने वाली मौतों की सबसे बड़ी संख्या है।
इजरायल रक्षा बल ने इन हमलों को सबसे बड़ा समन्वित अभियान करार दिया है। राजधानी बेरूत सहित लेबनान के दक्षिणी और पूर्वी हिस्सों में स्थित संदिग्ध ठिकानों को निशाना बनाया गया। बेरूत के प्रभावित इलाकों से मिल रही तस्वीरें तबाही का मंजर बयां कर रही हैं, जहां कई बहुमंजिला इमारतें मलबे में तब्दील हो गई हैं। इजरायल का दावा है कि ये हमले हिजबुल्लाह के उन बुनियादी ढांचों को नष्ट करने के लिए किए गए हैं, जिनका उपयोग इजरायली क्षेत्रों पर रॉकेट दागने के लिए किया जा रहा था।
इस भीषण सैन्य कार्रवाई के बीच वैश्विक कूटनीति के केंद्र में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी. वेंस का बयान चर्चा का विषय बना हुआ है। हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में पत्रकारों से बात करते हुए वेंस ने स्पष्ट किया कि लेबनान कभी भी अमेरिका और ईरान के बीच प्रस्तावित युद्धविराम सौदे का हिस्सा नहीं था।
वेंस ने कड़े शब्दों में कहा कि यदि ईरान इस संघर्ष के कारण बातचीत से पीछे हटना चाहता है, तो यह उसका अपना निर्णय होगा। उन्होंने तर्क दिया कि लेबनान के मोर्चे पर जो कुछ भी हो रहा है, उसका मूल युद्धविराम समझौते से कोई सीधा संबंध नहीं है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि न तो वाशिंगटन और न ही यरूशलेम ने कभी यह प्रतिबद्धता जताई थी कि लेबनान को इस समझौते के दायरे में रखा जाएगा।
विपक्षी दलों और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों द्वारा उठाई जा रही चिंताओं पर प्रतिक्रिया देते हुए वेंस ने स्वीकार किया कि इस मुद्दे पर भ्रम की स्थिति हो सकती है। उन्होंने इसे सभी पक्षों की ओर से एक वाजिब गलतफहमी बताया। उनका कहना है कि युद्धविराम की शर्तों को लेकर अलग-अलग व्याख्याएं की जा रही थीं, लेकिन आधिकारिक तौर पर लेबनान का मुद्दा इसमें कभी शामिल नहीं था।
लेबनान में बढ़ती मानवीय क्षति और अमेरिका द्वारा ईरान को दी गई स्पष्ट चेतावनी यह संकेत देती है कि आने वाले दिनों में यह क्षेत्रीय संघर्ष और अधिक जटिल हो सकता है। जहां एक ओर जमीन पर मौतों का आंकड़ा बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर कूटनीतिक मंचों पर शर्तों और समझौतों को लेकर रस्साकशी जारी है।