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ईरान युद्ध से प्रभावित हो गये हैं देश का समुद्री मछुआरे

हजारों ट्रॉलर तट पर यूं ही खड़े हो गये

राष्ट्रीय खबर

मुंबईः वर्तमान में जारी पश्चिम एशिया का युद्ध (मिडल ईस्ट वॉर) न केवल मध्य पूर्व की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित है, बल्कि इसका सीधा और विनाशकारी प्रभाव अब भारत के तटीय क्षेत्रों पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। वैश्विक भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल और रसोई गैस की भारी किल्लत ने भारतीय मछुआरों के जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है।

विशेष रूप से गोवा और महाराष्ट्र के मछुआरे इस समय एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहे हैं। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि सैकड़ों मछलियां पकड़ने वाली नावें और आधुनिक ट्रॉलर समुद्र की लहरों से दूर तटों पर खड़े रहने को मजबूर हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अगले कुछ दिनों में इस गतिरोध का समाधान नहीं हुआ, तो इन दोनों राज्यों की तटीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा सकती है।

मछुआरे जो गहरे समुद्र में हफ्तों तक प्रवास करते हैं, उनके लिए भोजन पकाने हेतु एलपीजी सिलेंडर एक अनिवार्य आवश्यकता है। वर्तमान में रसोई गैस इन मछुआरों के लिए सोने से भी अधिक कीमती और दुर्लभ हो गई है। तटीय क्षेत्रों में एलपीजी सिलेंडर की भारी कमी का फायदा उठाकर कालाबाजारी करने वाले सक्रिय हो गए हैं। खुले बाजार में एक सिलेंडर की कीमत 10,000 रुपये तक पहुंच गई है।

गहरे समुद्र में मछली पकड़ने के अभियान के दौरान, एक छोटी नाव जिसमें 4 से 5 लोग होते हैं, उन्हें कम से कम एक सिलेंडर की आवश्यकता होती है। वहीं, बड़े ट्रॉलरों को, जो 15 से 20 दिनों तक समुद्र में रहते हैं, तीन से चार सिलेंडरों की जरूरत पड़ती है। आपूर्ति की कमी के कारण अब मछुआरे अपनी जान जोखिम में डालकर नावों के भीतर लकड़ी की आग जलाकर खाना पकाने को मजबूर हैं।

लकड़ी की आग से लकड़ी के जहाज या फाइबर की नावों में आग लगने का खतरा बना रहता है। इस संकट के कारण कई मछुआरों ने अपनी समुद्र यात्रा की अवधि भी कम कर दी है, जिससे मछली पकड़ने के कुल उत्पादन में भारी गिरावट आई है।

रसोई गैस के साथ-साथ, थोक डीजल की कीमतों में हुई वृद्धि ने मछुआरों की कमर तोड़ दी है। एक मध्यम आकार के मछली पकड़ने वाले ट्रॉलर को 15 दिनों की एक यात्रा के लिए लगभग 2,000 से 30,000 लीटर डीजल की खपत करनी पड़ती है। ईंधन की लागत रातों-रात लगभग दोगुनी हो जाने के कारण मछुआरों के लिए व्यवसाय चलाना आर्थिक रूप से घाटे का सौदा बन गया है।