Breaking News in Hindi

जम्मू-कश्मीर में शराबबंदी पर महासंग्राम! धर्म बड़ा या राजस्व? जानें इस मुद्दे पर क्यों आमने-सामने हैं पार्टियां

जम्मू-कश्मीर में धर्म के आधार पर शराब पर प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर सियासी माहौल लगातार गरमाता नजर आ रहा है. अलग-अलग राजनीतिक दलों के बयान इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि इस मुद्दे पर फिलहाल कोई सर्वसम्मति नहीं बन पाई है. कांग्रेस नेता गुलाम अहमद मीर ने कहा कि अगर बिना ठोस रणनीति के पूर्ण शराबबंदी लागू की जाती है तो इससे अवैध तस्करी और ब्लैक मार्केटिंग को बढ़ावा मिल सकता है. उनके साथ इरफान लोन का भी मानना है कि इस तरह का फैसला जल्दबाजी में लिया गया तो इसके नकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं.

बीजेपी नेताओं का रुख थोड़ा संतुलित दिखाई दे रहा है. बलवंत सिंह मनकोटिया, पवन गुप्ता और श्यामलाल शर्मा ने कहा कि वो व्यक्तिगत तौर पर शराबबंदी के पक्ष में हैं लेकिन सरकार को राजस्व के नुकसान को भी ध्यान में रखना पड़ता है, इसलिए इस पर फैसला आसान नहीं है. नेशनल कॉन्फ्रेंस के मीर सैफुल्लाह ने कहा कि उनकी पार्टी इस मुद्दे पर सकारात्मक सोच रखती है लेकिन अंतिम निर्णय सरकार को ही लेना है.

राजस्व के नाम पर स्वास्थ्य से समझौता

पीडीपी के वहीद-उर-रहमान पारा ने आरोप लगाया कि राजस्व के नाम पर युवाओं के स्वास्थ्य से समझौता किया जा रहा है. निर्दलीय विधायक शेख खुर्शीद ने भी इस मुद्दे को सामाजिक और धार्मिक दृष्टिकोण से जोड़ते हुए अपनी चिंता जाहिर की. सरकार की ओर से खेल मंत्री सतीश शर्मा ने कहा कि वह व्यक्तिगत रूप से शराबबंदी के पक्ष में हैं और भविष्य में अगर इस संबंध में कोई विधेयक आता है तो वह विधानसभा में अपनी राय जरूर रखेंगे

क्या बोले उपमुख्यमंत्री सुरेंद्र चौधरी?

उपमुख्यमंत्री सुरेंद्र चौधरी ने कहा कि उन्हें धर्म के आधार पर घाटी में शराबबंदी की किसी औपचारिक मांग की जानकारी नहीं है. जो लोग इस मुद्दे को उठा रहे हैं, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि शराब की दुकानें नेशनल कॉन्फ्रेंस की सरकार के दौरान नहीं खुलीं. पीडीपी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा, जब उनकी सरकार थी तब भी शराब की दुकानें चलती रहीं और जब राज्यपाल शासन रहा और कई नई दुकानें खुलीं, तब पीडीपी ने इस पर कोई आपत्ति क्यों नहीं जताई.

मुद्दा धार्मिक भावनाओं तक सीमित नहीं

कुल मिलाकर जम्मू-कश्मीर में शराबबंदी का मुद्दा केवल धार्मिक भावनाओं तक सीमित नहीं है. बल्कि इसमें आर्थिक, सामाजिक और कानून-व्यवस्था से जुड़े कई पहलू शामिल हैं. ऐसे में इस पर कोई भी फैसला लेने से पहले व्यापक सहमति और ठोस नीति की जरूरत साफ तौर पर महसूस की जा रही है.