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दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक पारित

बैंकिंग प्रणाली और अर्थव्यवस्था को मजबूती देने की नई पहल

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: राज्यसभा ने बुधवार को दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (संशोधन) विधेयक, 2026 को संक्षिप्त चर्चा के बाद ध्वनि मत से पारित कर दिया। लोकसभा में यह विधेयक पहले ही 30 मार्च को पारित हो चुका था। चर्चा का जवाब देते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि यह कानून बैंकिंग प्रणाली को मजबूत करने और अर्थव्यवस्था में मूल्य वापस लाने में अत्यंत सहायक सिद्ध हुआ है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस कानून का मूल उद्देश्य केवल ऋण वसूली नहीं, बल्कि संकटग्रस्त कंपनियों को परिसमापन से बचाकर उन्हें पुनर्जीवित करना है।

वित्त मंत्री ने सदन को सूचित किया कि सरकार ने भाजपा सांसद बैजयंत पांडा की अध्यक्षता वाली चयन समिति की 11 प्रमुख सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है, जबकि एक संशोधन सरकार की ओर से लाया गया है। इन संशोधनों का मुख्य लक्ष्य निवेशकों के विश्वास को बढ़ाना और दिवाला प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। सीतारमण ने बताया कि 2017-18 में जहां हर एक कंपनी के समाधान पर पांच कंपनियां परिसमापन में जाती थीं, वहीं 2024-25 में यह अनुपात काफी सुधर गया है और अब लगभग एक-एक (1:1) के करीब पहुंच गया है।

आंकड़ों का विवरण देते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों ने विभिन्न माध्यमों से कुल 1,04,099 करोड़ रुपये की वसूली की है। इस कुल वसूली में अकेले आईबीसी माध्यम का योगदान 54,528 करोड़ रुपये रहा है, जो कुल वसूली का लगभग 52.3 फीसद है। उन्होंने कहा कि नए संशोधनों से यह सुनिश्चित होगा कि समाधान प्रक्रिया के दौरान नया व्यवसाय किसी भी बाधा से मुक्त रहे और पारदर्शिता बनी रहे।

विधेयक के नए प्रावधानों के तहत अब दिवाला मामलों को स्वीकार करने के लिए 14 दिनों की सख्त समय सीमा तय की गई है। साथ ही, अनावश्यक मुकदमेबाजी को रोकने के लिए तुच्छ कार्यवाही शुरू करने वालों पर भारी जुर्माना लगाने का प्रावधान भी किया गया है। वित्त मंत्री ने जोर देकर कहा कि इन बदलावों से ग्रुप इनसॉल्वेंसी और क्रॉस-बॉर्डर इनसॉल्वेंसी जैसे जटिल मामलों को सुलझाने में मदद मिलेगी, जिससे भारतीय दिवाला ढांचा अंतरराष्ट्रीय मानकों के समकक्ष आ जाएगा।