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एफसीआरए संशोधन विधेयक ठंडे बस्ते में डाला

केरल चुनावों में अपना हाथ झूलस जाने से भयभीत भाजपा

  • विधेयक पर विवाद के मुख्य कारण

  • केरल भाजपा की चिंताएं और चुनावी गणित

  • ईसाई वोट गवां देने के भय से लिया फैसला

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: केरल विधानसभा चुनावों की सरगर्मी के बीच, नरेंद्र मोदी सरकार ने बुधवार को लोकसभा में विवादास्पद विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक 2026 को टालने का निर्णय लिया है। विपक्ष के कड़े विरोध, ईसाई धर्मगुरुओं की आपत्तियों और केरल भाजपा के आंतरिक दबाव के बाद सरकार ने यह कदम उठाया है।

हालांकि यह विधेयक चर्चा और पारित होने के लिए सूचीबद्ध था, लेकिन प्रश्नकाल के दौरान संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने सदन को सूचित किया कि इसे फिलहाल नहीं लिया जाएगा। इस दौरान उन्होंने कांग्रेस और माकपा (CPI-M) पर इस मुद्दे पर जनता को गुमराह करने का आरोप भी लगाया।

प्रस्तावित विधेयक के अनुसार, यदि विदेशी चंदा प्राप्त करने वाली किसी संस्था का लाइसेंस रद्द या निलंबित किया जाता है, तो उस चंदे से बनाई गई संपत्तियों पर सरकार का अधिकार हो जाएगा। विपक्ष और चर्च संगठनों ने इसे मनमाना और दुरुपयोग की संभावनाओं वाला बताते हुए विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। उनका तर्क है कि यह कानून संस्थाओं को लक्षित करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है।

केरल में 9 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनावों ने भाजपा के लिए एक कठिन स्थिति पैदा कर दी है। राज्य भाजपा अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर, जो तिरुवनंतपुरम की एक महत्वपूर्ण सीट से चुनाव लड़ रहे हैं, ने केंद्रीय नेतृत्व से इस विधेयक को आगे न बढ़ाने का आग्रह किया था। सूत्रों के अनुसार, केरल भाजपा को डर है कि इस समय विधेयक पारित होने से ईसाई समुदाय में नकारात्मक संदेश जाएगा, जिससे पार्टी की चुनावी संभावनाओं को नुकसान पहुंच सकता है।

भाजपा वर्तमान में केरल में ईसाई समुदाय को साधने की सक्रिय कोशिश कर रही है। ऐसे में कैथोलिक चर्च, कांग्रेस और माकपा द्वारा लगाए गए उन आरोपों ने भाजपा को धर्मसंकट की स्थिति में डाल दिया है, जिसमें कहा गया है कि यह विधेयक विशेष रूप से ईसाइयों को निशाना बनाने के लिए लाया गया है।

भाजपा नेतृत्व इस बात को लेकर आशंकित है कि यदि बुधवार को लोकसभा में इस पर चर्चा होती, तो अल्पसंख्यकों का ध्रुवीकरण पार्टी के खिलाफ हो सकता था। वर्तमान राजनीतिक माहौल को देखते हुए, केंद्र का यह कदम केरल में ईसाई मतदाताओं के बीच अपनी पैठ बनाए रखने की एक सोची-समझी रणनीति मानी जा रही है। विपक्षी दल इसे अपनी नैतिक जीत बता रहे हैं, जबकि भाजपा इसे दुष्प्रचार के खिलाफ उठाया गया एहतियाती कदम करार दे रही है।