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पुराने मतदाता अपने ही घर में अजनबी बने

चुनाव आयोग के ए आई की बड़ी चूक सामने आयी

  • अफसरों ने जिम्मेदारी तकनीक पर डाल दी

  • कई पीढ़ियों से रहने वाले भी गैर वोटर बने

  • सारे सरकारी दस्तावेज जमा किये गये थे

राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः पश्चिम बंगाल में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले मतदाता सूची के पुनरीक्षण ने कई परिवारों को गहरा जख्म दिया है। शुक्रवार रात जारी की गई दूसरी पूरक सूची में करीब 12 लाख नाम शामिल थे, जिनमें से लगभग 40 प्रतिशत नामों को हटा दिया गया है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस प्रक्रिया में हुई गलतियों के लिए अधिकारी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस  को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, जिससे पीढ़ियों से यहाँ रह रहे नागरिक अब अपनी पहचान साबित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

चौरंगी के एक मतदाता मित्रा (नाम परिवर्तित) के दो बेटों के नाम सूची से काट दिए गए हैं। उनका बड़ा बेटा ब्रिटेन में ए आई इंजीनियर है और छोटा बेटा बेंगलुरु में रिसर्च स्कॉलर है। पिता का कहना है कि उनकी तीन पीढ़ियां एक ही स्कूल से पढ़ी हैं, फिर भी ए आई ने उन्हें संदिग्ध मान लिया। सुनवाई के दौरान उनसे कहा गया कि उनके और उनके पिता की आयु में 15 वर्ष से कम का अंतर है, जबकि वास्तविकता में यह अंतर 42 वर्ष का था।

आलिया विश्वविद्यालय में इस्लामिक थियोलॉजी विभाग के अध्यक्ष मोहम्मद शमीम अख्तर और उनके एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे बेटे का नाम भी सूची से हटा दिया गया है। अख्तर 2014 से बंगाल के पंजीकृत मतदाता हैं, लेकिन नाम की वर्तनी में अंतर जैसी तार्किक विसंगति बताकर उन्हें बाहर कर दिया गया।

चौरंगी के अब्दुल माजिद खान और बालीगंज के मोहम्मद अरसलान कमाल जैसे कई अन्य मतदाताओं ने भी यही दर्द साझा किया। वर्षों से मतदान कर रहे इन नागरिकों का कहना है कि पासपोर्ट, आधार कार्ड और जन्म प्रमाण पत्र जैसे पुख्ता दस्तावेज देने के बाद भी उन्हें हटा दिया गया, जिससे वे अपने ही देश में शरणार्थी जैसा महसूस कर रहे हैं।

जब प्रभावित मतदाताओं ने चुनाव अधिकारियों और बीएलओ से संपर्क किया, तो उन्हें कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला। अधिकारियों ने अपनी गलतियों का ठीकरा  कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर फोड़ दिया। मतदाताओं का आरोप है कि बिना मानवीय हस्तक्षेप और जमीनी हकीकत जाने डेटा के आधार पर नाम हटाए गए।