Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
गुरुग्राम में मूसलाधार बारिश से सड़कें बनीं दरिया: दिल्ली-जयपुर एक्सप्रेसवे पर लगा भीषण जाम, वर्क फ्... हिल स्टेशन पचमढ़ी में दिल दहला देने वाली वारदात: जंगल में ले जाकर 17 वर्षीय छात्रा से सामूहिक दुष्कर... प्रदर्शनकारियों के साथ हूं, एयरपोर्ट परियोजना रद्दः विजय भारत ने गेंहू भेजने पर लगी रोक अब हटा ली वर्ष 2021 में चूड़ाचांदपुर में सेना काफिले पर हुआ था हमला कर्नाटक के मुख्यमंत्री से मिले उद्योगपति गौतम अडाणी सेनापति में गोलीबारी में सीआरपीएफ जवान घायल अगर विपक्ष नहीं, तो इशारा किसकी तरफ था?: पी. चिदंबरम कांग्रेस ने कहा अब इसरो का गला घोंट रहे मोदी अमेरिका के अंधाधुंध आक्रमण से ईरान की सैन्य क्षमता उजागर

हरिश राणा को घरवालों ने दी अंतिम विदाई

सबको माफ करो और माफी मांगकर सो जाओ

  • सुप्रीम कोर्ट ने इच्छामृत्यु की अनुमति दी

  • हादसे के बाद लंबे समय से वह कोमा में

  • जीवन रक्षक उपकरण हटा दिये गये थे

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः कुछ विदाइयां आंखों में पानी छोड़ जाती हैं, तो कुछ रूह को एक अजीब सी खामोशी और सुकून की चादर में लपेट देती हैं। साहिबाबाद के हरीश राणा की अंतिम यात्रा कुछ ऐसी ही थी। एक दशक से ज्यादा लंबे शारीरिक कष्ट और कानूनी जद्दोजहद के बाद जब मौत आई, तो वह एक दुश्मन की तरह नहीं, बल्कि एक पुराने मित्र की तरह सुकून लेकर आई।

13 मार्च की वह दोपहर साहिबाबाद के उस घर के लिए भारी थी, जहां कभी हरीश की खिलखिलाहट गूंजती थी। हरीश को अंतिम विदाई देने के लिए ब्रह्मकुमारी केंद्र (प्रभु मिलन भवन) की बीके लवली दीदी पहुंचीं। उन्होंने मरणासन्न हरीश के माथे पर चंदन का तिलक लगाया, मानो किसी योद्धा का राजतिलक हो रहा हो।

उस शांत कमरे में दीदी के शब्द गूंजे—सबको माफ करते हुए और सबसे माफी मांगते हुए सो जाओ ठीक है? यह केवल विदाई के शब्द नहीं थे, बल्कि एक ऐसी आत्मा की मुक्ति का मंत्र था जो सालों से बेजान शरीर के पिंजरे में कैद थी। लवली दीदी ने हरीश के लिए ध्यान किया और उसके माता-पिता को ढांढस बंधाते हुए कहा कि हरीश अब अपने सबसे शांत सफर पर है।

एक तरफ आध्यात्मिक शांति थी, तो दूसरी तरफ एक मां का टूटता कलेजा। हरीश की मां निर्मला देवी की आंखों के सामने 12 सितंबर 1993 की वह तस्वीर नाच रही थी, जब दिल्ली के एक अस्पताल में हरीश का जन्म हुआ था। वह मेरा पहला बच्चा था, पूरे घर ने गीत गाए थे, निर्मला देवी बिलखते हुए कहती हैं।

वह याद करती हैं कि हरीश कितना भोला था। मैं उसे डांटती थी तो वह किसी कोने में जाकर छिप जाता। लेकिन उसे मुझसे ज्यादा देर दूर रहना नहीं आता था। थोड़ी देर बाद चुपचाप आता और मेरे गले लग जाता। अपने नन्हे हाथों से मेरा चेहरा सहलाने लगता, मानो कह रहा हो, मम्मी अब गुस्सा छोड़ दो।

हरीश के शरीर ने साथ छोड़ दिया था, लेकिन उसकी सांसें एक अंतहीन पीड़ा का गवाह बनी हुई थीं। बिस्तर पर पड़े-पड़े गलते शरीर और असहनीय दर्द को देख माता-पिता ने भारी मन से दिल्ली हाईकोर्ट से इच्छामृत्यु की गुहार लगाई थी। 8 जुलाई 2025 को जब याचिका खारिज हुई, तो परिवार टूट गया था। लेकिन अंततः 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश की पीड़ा को समझा और इच्छामृत्यु की अनुमति दी।

हरीश अब सो चुका है। वह किसी कोने में नहीं छिपा, बल्कि एक ऐसी जगह चला गया है जहां न दर्द है, न बिस्तर की बेड़ियां और न ही अदालती तारीखें। पीछे रह गई है एक मां की यादें और लवली दीदी के वे शब्द, जो सिखाते हैं कि अंत में केवल क्षमा और शांति ही शेष रह जाती है।