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चंद्रमा की धूल में चना  क्रांति कर दिखाया वैज्ञानिकों ने

अंतरिक्ष कृषि की नई दिशा में बड़ा कदम

  • प्रयोग की चुनौतियाँ और प्रक्रिया

  • आखिर चने का ही चयन क्यों

  • अंतरिक्ष में खेती की शुरूआत है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः अंतरिक्ष विज्ञान के इतिहास में 12 मार्च 2026 की तारीख एक स्वर्णिम अध्याय के रूप में दर्ज की गई है। वैज्ञानिकों ने एक अभूतपूर्व प्रयोग में सफलता पाते हुए चंद्रमा की नकली मिट्टी (जिसे लूनर रेगुलेथ कहा जाता है) में चना उगाने में कामयाबी हासिल की है। यह खोज न केवल वनस्पति विज्ञान के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भविष्य के आर्टेमिस मिशन और मंगल ग्रह पर मानव बस्तियों को बसाने के सपने को साकार करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

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चंद्रमा की सतह पर मौजूद धूल पृथ्वी की मिट्टी जैसी उपजाऊ नहीं होती। इसमें जैविक तत्वों की भारी कमी होती है और यह अत्यधिक तीखी और संक्षारक होती है। वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस बंजर धूल को उपजाऊ बनाने की थी। इस बाधा को पार करने के लिए शोधकर्ताओं ने वर्म कंपोस्ट (केंचुआ खाद) और विशेष प्रकार के कवक का उपयोग किया। इन सूक्ष्मजीवों ने मिट्टी के विषैलेपन को कम करने और पौधों की जड़ों को पोषण सोखने में मदद की।

वैज्ञानिकों ने चने का चुनाव इसलिए किया क्योंकि यह प्रोटीन का एक बेहतरीन स्रोत है और इसमें अन्य फसलों की तुलना में कम पानी की आवश्यकता होती है। प्रयोग के दौरान देखा गया कि चंद्रमा की मिट्टी में उगाए गए चने के पौधे स्वस्थ थे, हालांकि उनकी वृद्धि पृथ्वी की सामान्य मिट्टी के मुकाबले थोड़ी धीमी रही। शोधकर्ताओं ने पाया कि पौधों ने खुद को चंद्रमा के कम गुरुत्वाकर्षण और रेडिएशन जैसी परिस्थितियों के अनुरूप ढालने के लिए अपने जेनेटिक स्ट्रक्चर में सूक्ष्म बदलाव किए।

इस सफलता का अर्थ है कि भविष्य के अंतरिक्ष यात्री पृथ्वी से भोजन ले जाने के बजाय चंद्रमा पर ही अपनी स्पेस फार्मिंग कर सकेंगे। इससे मिशन की लागत में भारी कमी आएगी और लंबी अवधि के अभियानों के लिए ताज़ा भोजन उपलब्ध होगा। वर्तमान में वैज्ञानिक इस बात पर शोध कर रहे हैं कि क्या इन चनों का स्वाद और पोषण मूल्य पृथ्वी पर उगने वाले चनों के समान ही है।

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