पुलों की मजबूती पर सैटेलाइट से परीक्षण
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आपदा से पहले खतरों की पहचान
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वैश्विक विश्लेषण और बढ़ता जोखिम
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स्पेस से सूक्ष्म हलचल की पहचान
राष्ट्रीय खबर
रांचीः वैज्ञानिक अब अंतरिक्ष में मौजूद सैटेलाइट्स का उपयोग यह पता लगाने के लिए कर रहे हैं कि दुनिया भर के कौन से पुल गिरने के कतरे में हैं। इस तकनीक का उद्देश्य किसी बड़े हादसे के होने से पहले ही समस्याओं को पकड़ना है। शोध के अनुसार, पुलों के निरीक्षण में सैटेलाइट निगरानी को शामिल करने से उच्च जोखिम (High Risk) की श्रेणी में रखे गए ढांचों की संख्या में लगभग एक तिहाई की कमी आती है। जो पुल अभी भी उच्च जोखिम में हैं, उनमें से लगभग आधे अंतरिक्ष से होने वाले निरंतर अवलोकन से लाभान्वित हो सकते हैं।
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विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सबसे बड़ा लाभ अफ्रीका और ओशिनिया जैसे क्षेत्रों में हो सकता है, जहाँ वर्तमान में पुलों की निगरानी बहुत सीमित या लगभग न के बराबर है। ह्यूस्टन विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। वे दुनिया भर के असुरक्षित पुलों की पहचान कर रहे हैं और संभावित विफलताओं को रोकने के लिए एक नया रास्ता दिखा रहे हैं।
नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित 744 पुलों के वैश्विक विश्लेषण में, पीयत्रो मिलिलो और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के सहयोगियों ने दुनिया भर के पुलों की स्थिति का मूल्यांकन किया। उनके परिणामों से पता चला कि उत्तरी अमेरिका के पुल आम तौर पर सबसे खराब स्थिति में हैं, इसके बाद अफ्रीका का नंबर आता है। टीम ने एक ऐसी रणनीति का प्रस्ताव दिया है जो सैटेलाइट्स के माध्यम से पुलों की स्थिरता को ट्रैक करने और चेतावनी के संकेतों को जल्दी पहचानने में मदद करेगी।
अध्ययन में पहचाने गए कई पुल अपनी निर्धारित जीवन अवधि की सीमा के करीब पहुँच रहे हैं। उत्तरी अमेरिका में पुलों के निर्माण में 1960 के दशक के दौरान तेजी आई थी, जिसका अर्थ है कि इनमें से कई ढांचे अब दशकों पुराने हो चुके हैं और अपनी मूल डिजाइन उम्र को पार कर रहे हैं।
इस चुनौती से निपटने के लिए, शोधकर्ता सिंथेटिक अपर्चर रडार पर आधारित अंतरिक्ष निगरानी प्रणालियों की मदद ले रहे हैं। यह तकनीक उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाली तस्वीरें लेती है और पृथ्वी के बड़े क्षेत्रों को कवर करती है। ह्यूस्टन विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर पीयत्रो मिलिलो ने कहा, हमारा शोध बताता है कि अंतरिक्ष आधारित रडार निगरानी दुनिया के 60 प्रतिशत से अधिक लंबे पुलों की नियमित देखरेख कर सकती है।
शोधकर्ताओं ने मल्टी-टेम्पोरल इंटरफेरोमेट्रिक सिंथेटिक अपर्चर रडार नामक एक रिमोट सेंसिंग पद्धति का उपयोग किया। यह तकनीक कुछ मिलीमीटर जितनी छोटी हलचलों को भी माप सकती है, जो भूस्खलन या जमीन धंसने जैसी धीमी भूगर्भीय प्रक्रियाओं के कारण होती हैं। वर्तमान में पुलों का भौतिक निरीक्षण महंगा होता है और आमतौर पर साल में केवल दो बार किया जाता है, जिससे निरीक्षणों के बीच होने वाली गिरावट पर ध्यान नहीं जा पाता।
संरचनात्मक स्वास्थ्य निगरानी सेंसर आमतौर पर केवल नए या समस्याग्रस्त पुलों पर ही लगाए जाते हैं। अध्ययन के अनुसार, दुनिया के 20 फीसद से भी कम लंबे पुलों में ये सेंसर लगे हैं। सैटेलाइट डेटा को पारंपरिक निरीक्षणों के साथ जोड़ने से इंजीनियरों को अधिक सटीक जानकारी मिलेगी। यह दृष्टिकोण यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के सेंटिनल-1 और नासा के हालिया निसार मिशन जैसे डेटा का उपयोग करता है। इस तकनीक के नियमित उपयोग से अधिकारी पुलों की स्थिति का स्पष्ट चित्र प्राप्त कर सकेंगे और जोखिम प्रबंधन पर बेहतर निर्णय ले सकेंगे।
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