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बिहार और  बंगाल को मिलाकर नया प्रदेश

नीतीश के दिल्ली जाने के बाद दूसरी चर्चा भी जोर पकड़ रही

  • पिछले चुनाव में भी चर्चा हुई थी

  • चिकन नेक कॉरिडोर का हवाला

  • दोनों राज्यों से हिस्सा लेने की बात

रजत कुमार गुप्ता

रांचीः भारत सरकार द्वारा इस बारे में कोई औपचारिक घोषणा नहीं की गयी है। इसके बाद भी बिहार के  मुख्यमंत्री पद से नीतीश कुमार के जाने के साथ साथ भाजपा खेमा ने एक नया प्रचार प्रारंभ कर दिया है। इस बारे में पश्चिम बंगाल चुनाव के वक्त भी माहौल  बनाया गया था। अब फिर से चुनाव करीब आते ही यह चर्चा जोर पकड़ रही है। यद्यपि इस क्षेत्र में क्षेत्रीय पुनर्गठन को लेकर समय-समय पर अफवाहें और राजनीतिक माँगें उठती रहती हैं, वर्तमान में केंद्र सरकार का ध्यान क्षेत्रीय विभाजन के बजाय सुरक्षा और जनसांख्यिकीय निगरानी पर केंद्रित है।

फरवरी 2026 की हालिया रिपोर्टों के अनुसार, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सीमांचल क्षेत्र (बिहार और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिले) का दौरा किया था। हालांकि, उनका यह दौरा सीमा सुरक्षा, जनसांख्यिकीय परिवर्तन और घुसपैठ के मुद्दों पर केंद्रित था, न कि राज्य के विभाजन पर। उन्होंने सीमा चौकियों का उद्घाटन किया और सीमावर्ती जिलों में जनसंख्या परिवर्तन के अध्ययन के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति बनाने की घोषणा की।

सरकार ने पश्चिम बंगाल और बिहार में घुसपैठियों की पहचान करने के लिए मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन की प्रक्रिया शुरू की है। यह एक प्रशासनिक अभ्यास है जिसे लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज है, लेकिन यह किसी नए राज्य के गठन का संकेत नहीं है।

सोशल मीडिया या स्थानीय समाचारों में अक्सर सीमांचल राज्य या उत्तर बंगाल राज्य के बारे में चर्चाएँ होती रहती हैं। यद्यपि स्थानीय नेता बेहतर शासन या सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व के लिए समय-समय पर ये माँगें उठाते हैं, लेकिन संसद में इस तरह के पुनर्गठन के लिए कोई विधेयक या प्रस्ताव पेश नहीं किया गया है।

जो चर्चा अभी जोर पकड़ चुकी है, उसके मुताबिक इस प्रस्तावित केंद्र शासित प्रदेश में बिहार के पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज, पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग, कालिंपोंग, अलीपुरद्वार को शामिल करना है। इसके जरिए भाजपा के लोग यह भी दावा कर रहे हैं कि इसके जरिए शिलिगुड़ी कॉरिडोर यानी चिकन नेक को मजबूती प्रदान करने की मोदी सरकार की इच्छा है।

गृह मंत्रालय का निरंतर यह रुख रहा है कि नए राज्यों के गठन का निर्णय आर्थिक व्यवहार्यता और सामाजिक सहमति जैसे व्यापक कारकों पर निर्भर करता है। वर्तमान में, केंद्र सरकार नए राज्य बनाने के बजाय मौजूदा सीमावर्ती क्षेत्रों को विकसित करने के लिए सीमा पर बाड़ लगाने और वाइब्रेंट विलेज जैसे कार्यक्रमों को प्राथमिकता दे रही है।