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भारतीय किसानों की सरकारी उपेक्षा क्यों

गत शनिवार से भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौते का ढांचा सामने आते ही देश में एक तीखी बहस छिड़ गई है। इस समझौते ने एक पुरानी और महत्वपूर्ण दुविधा को फिर से उजागर कर दिया है कि आखिर मुक्त व्यापार की कीमत किसे चुकानी पड़ती है और इसके लाभ कौन उठाता है? जैसे-जैसे किसान संगठन 12 फरवरी को राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रहे थे,  उनका आक्रोश सिर्फ सेब, सोयाबीन तेल या सूखे डिस्टिलर्स अनाज पर आयात शुल्क में ढील तक सीमित नहीं है।

यह मुद्दा विश्वास, पारदर्शिता और भारतीय कृषि के भविष्य से जुड़ा है। केंद्र सरकार का दावा है कि किसानों के हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय किए गए हैं। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने किसानों को आश्वस्त किया है कि न्यूनतम आयात मूल्य, कोटा-आधारित रियायतें और शुल्क में कटौती को इस तरह से लागू किया जाएगा कि घरेलू उत्पादकों को नुकसान न हो। कागज पर ये आश्वासन भले ही सुकून देने वाले लगें, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर किसानों की आशंकाएं निराधार नहीं हैं।

लेकिन हम जमीनी हकीकत देखते हैं तो पता चलता है कि तीन काले कानूनों को लाने और मजबूरी में वापस लेने के दौरान खुद केंद्र सरकार ने जो वादे किये थे, उन्हें अब पूरी तरह भूला दिया गया है। इतिहास गवाह है कि न्यूजीलैंड और यूरोपीय संघ के साथ हुए पिछले मुक्त व्यापार समझौतों के बाद सस्ते आयात में भारी उछाल आया था, जिसने पहले से ही संघर्ष कर रहे भारतीय उत्पादकों की कमर तोड़ दी थी। आज हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के सेब किसानों के सामने सबसे बड़ा डर यह है कि वे अमेरिका और यूरोप के भारी सब्सिडी प्राप्त कृषि-व्यवसायों का मुकाबला कैसे करेंगे?

केंद्र सरकार भले ही यह दावा करे कि कृषि और डेयरी क्षेत्र सुरक्षित हैं, लेकिन समझौते का संयुक्त ढांचा कृषि और खाद्य उत्पादों की एक विस्तृत श्रृंखला पर शुल्क कम करने और गैर-टैरिफ बाधाओं को हल करने की बात करता है। यह विरोधाभास किसानों को बेचैन कर रहा है। आज के समय में जब किसान कम आय, बढ़ती इनपुट लागत और बढ़ते कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं, उन्हें इन नीतिगत फैसलों पर पूर्ण स्पष्टता की आवश्यकता है। कई किसान यूनियनों, विपक्षी दलों और कुछ राज्य सरकारों ने मांग की है कि इस समझौते का पूरा विवरण संसद के पटल पर रखा जाए।

अब हालत यह है कि विवादास्पद मुद्दों पर जब मोदी सरकार सदन में घिर जाती है तो गैर जरूरी मुद्दे उठाकर सदन का ध्यान भटकाया जाता है। किसानों की यह मांग अत्यंत तर्कसंगत है, क्योंकि व्यापार समझौते किसी व्यक्ति की आजीविका को घरेलू कानूनों की तरह ही गहराई से प्रभावित करते हैं। जब तक सरकार घरेलू स्तर पर मजबूत समर्थन प्रणाली—जैसे उचित मूल्य, सब्सिडी, बुनियादी ढांचा और जोखिम सुरक्षा—सुनिश्चित नहीं करती, तब तक बाजारों को खोलने के कदम छोटे और सीमांत किसानों को पूरी तरह से तबाह कर सकते हैं।

सामान्य हड़ताल सरकार के लिए एक चेतावनी है। यदि सरकार वास्तव में यह मानती है कि यह समझौता किसानों के हितों को प्राथमिकता देता है, तो उसे इसे पारदर्शिता, संसदीय चर्चा और सार्थक परामर्श के जरिए साबित करना चाहिए। अक्सर सुधारों की जो कहानी सरकारें सुनाती हैं, वह उन लोगों की चिंताओं को संबोधित करने में विफल रहती है जो वास्तव में देश का पेट भरते हैं।

यदि यह समझौता बिना किसी व्यापक सहमति और सुरक्षा के लागू होता है, तो यह न केवल कृषि क्षेत्र के लिए हानिकारक होगा, बल्कि सरकार और अन्नदाताओं के बीच के भरोसे को भी स्थायी रूप से कमजोर कर देगा। अंततः, व्यापार का उद्देश्य देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करना होना चाहिए, न कि उस रीढ़ की हड्डी को तोड़ना जिस पर भारत का सामाजिक और आर्थिक ढांचा टिका हुआ है।

सरकार को अपनी नीतियों को ‘विकास’ के चश्मे से देखने के बजाय ‘समावेशिता’ के चश्मे से देखने की जरूरत है, ताकि किसान खुद को इस नई वैश्विक व्यवस्था में पीड़ित नहीं, बल्कि भागीदार महसूस कर सकें। साथ ही मोदी सरकार को अपनी इस सोच को बदलना होगा कि देश के लिए सिर्फ वे ही बेहतर फैसला ले सकते हैं। खेतों में जो किसान दिन रात परिश्रम करता है और जिसे उपज से जुड़ी तमाम परेशानियों का बेहतर अनुभव है, वह ऐसे मामलों में सरकार और उनके अफसरों से बेहतर सोच सकता है क्योंकि यह उनकी जिंदगी से जुड़ा हुआ सवाल है। हर बार चंद लोगों के फायदे के लिए पूरे देश के भविष्य को दांव पर लगाना कोई सामान्य बात नहीं होती और देश में रहने वाले हर किसी को हर गलत फैसले का नुकसान तो उठाना ही पड़ता है।