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अखाड़ा परिषद ने योगी के पक्ष में बयान दिया

प्रयागराज से प्रारंभ हुआ विवाद अब पर्दे से बाहर आ रहा

राष्ट्रीय खबर

लखनऊ: उत्तर प्रदेश की राजनीति और धर्म जगत में उस समय हलचल तेज हो गई जब अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार कर लिया। संभल में आयोजित कल्कि महोत्सव के दौरान अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष महंत रवींद्र पुरी महाराज ने स्पष्ट किया कि संत समाज मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ मजबूती से खड़ा है और किसी भी प्रकार की ‘दबाव की राजनीति’ को स्वीकार नहीं करेगा।

यह विवाद तब गहराया जब शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने बटुकों के कथित अपमान और ‘गौ माता’ को राष्ट्रमाता घोषित करने की मांग को लेकर 11 मार्च को लखनऊ कूच करने का ऐलान किया। इस दौरान उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की हिंदू पहचान को लेकर भी कुछ तीखी टिप्पणियाँ की थीं।

रवींद्र पुरी महाराज ने इन बयानों की कड़ी निंदा करते हुए कहा, शंकराचार्य पद की एक गरिमा होती है, उन्हें इस तरह की दादागिरी शोभा नहीं देती। मुख्यमंत्री के लिए अपशब्दों का प्रयोग करना अनुचित है। उन्होंने साफ कर दिया कि कोई भी प्रमुख अखाड़ा या बड़ा संत संगठन इस आंदोलन में शंकराचार्य के साथ नहीं है।

महंत रवींद्र पुरी ने जोर देकर कहा कि सनातन धर्म के मुद्दों को सरकार के साथ टकराव के बजाय संवाद से हल किया जाना चाहिए। उन्होंने बताया कि गौ माता को राष्ट्रमाता का दर्जा दिलाने के लिए गृह मंत्री और मुख्यमंत्री से सकारात्मक बातचीत चल रही है। ऐसे में सरकार पर बेवजह दबाव बनाना संतों के हित में नहीं है। डिप्टी सीएम बृजेश पाठक के महापाप वाले बयान का समर्थन करते हुए उन्होंने कहा कि बटुकों के मामले में सरकार पहले ही जांच और कार्रवाई का भरोसा दे चुकी है।

इस मौके पर कल्कि पीठाधीश्वर आचार्य प्रमोद कृष्णम ने भी शंकराचार्य पर निशाना साधा। उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में कहा कि योगी आदित्यनाथ धमकियों से नहीं डरते। उन्होंने कहा, अविमुक्तेश्वरानंद जितना लखनऊ की ओर बढ़ेंगे, योगी जी की लोकप्रियता उतनी ही ज्यादा बढ़ेगी।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ लोग सनातन को भीतर से तोड़ने की साजिश रच रहे हैं और उनका असली निशाना केवल योगी आदित्यनाथ हैं। संत समाज के इस रुख ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आगामी दिनों में धार्मिक और राजनीतिक गलियारों में यह तकरार और बढ़ सकती है, क्योंकि एक ओर पद की मर्यादा है तो दूसरी ओर सत्ता और संगठन का अटूट विश्वास।