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निगम चुनाव प्रचार में हो रही है वादों की थोक बारिश

कई लोगों की नजर अगले चुनाव के धंधे पर

  • समर्थक देने की ठेकेदारी जारी है

  • अगले चुनावों की सौदेबाजी होगी

  • प्रचार गाड़ियों में गीत भी बज रहे

राष्ट्रीय खबर

रांची: झारखंड की राजधानी रांची में नगर निगम चुनाव का बिगुल बजते ही सियासी पारा अपने चरम पर पहुंच गया है। शहर की हर गली, मोहल्ले और चौराहों पर चुनावी रंग पूरी तरह चढ़ चुका है। सुबह की पहली किरण से लेकर देर रात तक पूरा शहर प्रचार के शोर में डूबा रहता है। लाउडस्पीकरों से लैस प्रचार गाड़ियाँ लगातार प्रत्याशियों के वादों और घोषणाओं का बखान कर रही हैं, जिससे आम जनता के बीच एक अजीब सी हलचल पैदा हो गई है।

इस बार के चुनाव में सबसे खास बात महिलाओं की सक्रिय भागीदारी है। टोलियों और जत्थों में महिलाएं सड़कों पर उतर रही हैं, जो हाथ में पोस्टर-बैनर लिए नारों के साथ माहौल को जीवंत बना रही हैं। हालांकि, इस जोश के बीच चुनावी रंजिश की कड़वाहट भी देखने को मिल रही है। रात के अंधेरे में या भीड़ का फायदा उठाकर विरोधियों के पोस्टर और बैनर फाड़ने की घटनाएं भी आम हो गई हैं, जो इस कांटे की टक्कर को और कड़ा बना रही हैं।

दिलचस्प बात यह है कि एक ही राजनीतिक दल से कई दावेदार मैदान में उतर आए हैं। इस स्थिति ने बड़े नेताओं को भारी असमंजस और धर्मसंकट में डाल दिया है। वे किसी एक के पक्ष में खुलकर बोलने से बच रहे हैं। पर्दे के पीछे से असंतुष्टों को मनाने और मैनेज करने की कोशिशें तो बहुत हो रही हैं, लेकिन अभी तक किसी ठोस सफलता के संकेत नहीं मिले हैं। बागी तेवर अपनाने वाले प्रत्याशी किसी भी कीमत पर पीछे हटने को तैयार नहीं हैं।

इस चुनाव में प्रचार के तरीके ने एक नया आर्थिक रूप ले लिया है। बाजार में अब समर्थक जुटाने की ठेकेदारी चल रही है। सूत्र बताते हैं कि कुछ प्रभावशाली लोगों ने भीड़ जुटाने का ठेका ले रखा है। प्रत्याशी से प्रति व्यक्ति 500 रुपये प्रतिदिन की दर से भुगतान लिया जाता है। लेकिन इसमें गजब का मुनाफाखोरी का खेल है—ठेकेदार संबंधित महिला या पुरुष को केवल 200 रुपये देते हैं और खुद प्रति व्यक्ति 300 रुपये की सीधी कमाई कर रहे हैं। यह अब एक अल्पकालिक रोजगार बन गया है।

प्रत्याशियों की इस भीड़ में कुछ चेहरे ऐसे भी हैं जिनकी निगाहें निगम की कुर्सी पर कम और आने वाले विधानसभा व लोकसभा चुनावों पर ज्यादा हैं। उनके करीबियों का मानना है कि यह चुनाव लड़ना एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। जीत मिले या हार, उन्हें इस चुनाव में जितने वोट मिलेंगे, वही उनकी असली पूंजी होगी।

भविष्य में बड़े दलों के साथ टिकट या अन्य लाभ के लिए ये उम्मीदवार अपने प्राप्त वोटों को सौदेबाजी के हथियार के रूप में इस्तेमाल करेंगे। कुल मिलाकर, रांची नगर निगम का यह चुनाव केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित न रहकर भविष्य की बड़ी राजनीति की प्रयोगशाला बन गया है।