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किसानों का उग्र विरोध और राजमार्गों की नाकाबंदी

फ्रांस की सरकार को देश के भीतर मिली कठिन चुनौती

पेरिस: फ्रांस की राजधानी पेरिस आज एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रही है। देश के विभिन्न हिस्सों से आए हजारों किसानों ने अपने ट्रैक्टरों और कृषि वाहनों के साथ पेरिस की ओर जाने वाले आठ प्रमुख राजमार्गों को पूरी तरह से अवरुद्ध कर दिया है। इस पेरिस की घेराबंदी ने न केवल यातायात को ठप कर दिया है, बल्कि राजधानी की आवश्यक आपूर्ति श्रृंखला पर भी संकट के बादल मंडरा दिए हैं।

किसान संगठनों का यह आक्रोश अचानक नहीं भड़का है, बल्कि इसके पीछे नीतिगत असंतोष के गहरे कारण हैं। किसान यूरोपीय संघ के उन नए कृषि आयात नियमों का विरोध कर रहे हैं, जो गैर-यूरोपीय देशों (विशेष रूप से यूक्रेन और लैटिन अमेरिकी देशों) से सस्ते कृषि उत्पादों के आयात की अनुमति देते हैं।

फ्रांसीसी किसानों का तर्क है कि विदेशी उत्पादों पर वे कड़े पर्यावरण और श्रम मानक लागू नहीं होते जो उन पर थोपे गए हैं, जिससे वे बाजार में पिछड़ रहे हैं। कृषि कार्यों में उपयोग होने वाले डीजल पर सब्सिडी को धीरे-धीरे खत्म करने और करों को बढ़ाने के सरकारी फैसले ने आग में घी का काम किया है।

प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी है कि वे तब तक पीछे नहीं हटेंगे जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं हो जातीं। इसके परिणामस्वरूप पेरिस को होने वाली ताजी सब्जियों, फलों और दूध की आपूर्ति गंभीर रूप से बाधित होने की संभावना है। विशेष रूप से रुंगिस अंतरराष्ट्रीय बाजार, जो पेरिस की भोजन आपूर्ति का मुख्य केंद्र है, किसानों के निशाने पर है। जवाब में, फ्रांसीसी सरकार ने 15,000 से अधिक दंगा पुलिस कर्मियों और बख्तरबंद वाहनों को तैनात किया है। प्रशासन का मुख्य उद्देश्य प्रदर्शनकारियों को सरकारी इमारतों, हवाई अड्डों और मुख्य बाजारों तक पहुँचने से रोकना है।

यह आंदोलन केवल फ्रांस की सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है। बेल्जियम, जर्मनी, और पोलैंड जैसे पड़ोसी देशों में भी किसान इसी तरह के विरोध प्रदर्शनों की तैयारी कर रहे हैं। यह स्थिति पूरे यूरोपीय संघ के ‘ग्रीन डील’ और मुक्त व्यापार समझौतों की वैधता पर सवाल खड़े कर रही है। फ्रांस के राष्ट्रपति पर अब दोहरा दबाव है। एक ओर उन्हें घरेलू खाद्य सुरक्षा और कानून-व्यवस्था को बनाए रखना है, तो दूसरी ओर यूरोपीय संघ के कड़े नियमों के बीच संतुलन साधना है। किसान संगठनों की स्पष्ट मांग है कि उन्हें सब्सिडी दी जाए और विदेशी उत्पादों पर सख्त टैरिफ लगाए जाएं। फिलहाल, सरकार और किसान यूनियनों के बीच बातचीत के कोई ठोस संकेत नहीं मिले हैं। यदि पुलिस ने बलपूर्वक जाम हटाने का प्रयास किया, तो आने वाले घंटों में यह शांतिपूर्ण प्रदर्शन हिंसक झड़पों में बदल सकता है।