सुबह से ही मतदान केंद्रों के बाहर लगी है लंबी कतारें
टोक्योः जापान में आज सुबह सूरज की पहली किरण के साथ ही निचले सदन के लिए मतदान की प्रक्रिया शुरू हो गई है। यह चुनाव न केवल जापान की आंतरिक स्थिरता बल्कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र की भू-राजनीति के लिए भी एक निर्णायक मोड़ माना जा रहा है।
कुल 465 सीटों पर हो रहे इस मुकाबले में 289 सीटों पर एकल-निर्वाचन क्षेत्र प्रणाली और 176 सीटों पर आनुपातिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से उम्मीदवारों का चयन किया जा रहा है। सत्ता के गलियारों में यह चर्चा आम है कि वर्तमान प्रधानमंत्री के नेतृत्व वाली लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी, जिसने दशकों तक जापानी राजनीति पर अपना वर्चस्व बनाए रखा है, इस बार अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है।
चुनाव के केंद्र में इस समय अर्थव्यवस्था और बढ़ती महंगाई है। जापान, जो लंबे समय तक अपस्फीति से जूझता रहा था, अब अचानक बढ़ती जीवन यापन की लागत और कमजोर येन के कारण संकट में है। आम नागरिकों के लिए दैनिक वस्तुओं की कीमतें आसमान छू रही हैं, जिससे मतदाताओं में असंतोष व्याप्त है।
विपक्षी दलों ने इसी मुद्दे को अपनी ताकत बनाया है और सरकार पर आर्थिक कुप्रबंधन का आरोप लगाया है। दूसरी ओर, साने ताकाइची के नेतृत्व वाला रूढ़िवादी धड़ा राष्ट्रीय गौरव और सुरक्षा के नारे के साथ मैदान में है। ताकाइची का गुट रक्षा बजट को जीडीपी के 2% तक बढ़ाने और सेना को आधुनिक बनाने की वकालत कर रहा है, जिसे वे चीन की बढ़ती सैन्य सक्रियता और उत्तर कोरिया के मिसाइल परीक्षणों का मुकाबला करने के लिए अनिवार्य मानते हैं।
सामाजिक मोर्चे पर भी चुनौतियां कम नहीं हैं। जापान की तेजी से बूढ़ी होती आबादी और घटती जन्म दर ने एक गंभीर जनसांख्यिकीय संकट पैदा कर दिया है। युवाओं में बेरोजगारी की चिंता और बुजुर्गों के लिए पेंशन व स्वास्थ्य सेवाओं की अपर्याप्तता मतदान के रुझानों को गहराई से प्रभावित कर रही है। टोक्यो, ओसाका और क्योटो जैसे बड़े महानगरों के मतदान केंद्रों पर आज सुबह से ही मतदाताओं की लंबी कतारें देखी गई हैं, जो इस बात का संकेत है कि जनता बदलाव या निरंतरता को लेकर अत्यंत जागरूक है।
विशेषज्ञों का विश्लेषण है कि यदि इस चुनाव में सत्ता परिवर्तन होता है या एलडीपी को पूर्ण बहुमत नहीं मिलता, तो जापान की विदेश नीति में बड़े बदलाव आ सकते हैं। एक नई सरकार चीन के साथ आर्थिक संबंधों को फिर से परिभाषित कर सकती है या क्षेत्रीय सुरक्षा समझौतों में अपनी भूमिका को नया आयाम दे सकती है। आज शाम जब मतपेटियां बंद होंगी और शुरुआती रुझान सामने आएंगे, तब यह स्पष्ट होगा कि जापानी जनता ने आर्थिक सुरक्षा को प्राथमिकता दी है या पारंपरिक सैन्य मजबूती को।