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झारखंड में फिर फंसेगी डीजीपी की गाड़ी

यूपीएससी को कार्रवाई की अनुमति से बदलेगा समीकरण

  • अनुराग गुप्ता का मामला भी फंसा था

  • अब यूपीएसकी के पास कानूनी हथियार

  • तीन वरीय अफसर पहले से मौजूद हैं

राष्ट्रीय खबर

रांचीः झारखंड में पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति का मामला एक बार फिर कानूनी और प्रशासनिक विवादों के घेरे में आ गया है। हाल ही में हेमंत सोरेन सरकार द्वारा तदाशा मिश्रा को राज्य की नई डीजीपी नियुक्त किए जाने के बाद यह संकट गहरा गया है। इस नियुक्ति ने न केवल प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा की है, बल्कि संघ लोक सेवा आयोग के कड़े रुख ने राज्य सरकार की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है।

झारखंड सरकार का यह फैसला इसलिए विवादों में है क्योंकि तदाशा मिश्रा (1994 बैच) को जिम्मेदारी सौंपते समय विभाग में मौजूद तीन अत्यंत वरिष्ठ अधिकारियों की अनदेखी की गई। वर्तमान में अनिल पाल्टा (1990 बैच), प्रशांत सिंह (1992 बैच) और एम.एस. भाटिया (1993 बैच) जैसे वरिष्ठ अधिकारी मौजूद हैं, जो वरीयता क्रम में तदाशा मिश्रा से ऊपर हैं और डीजी रैंक पर कार्यरत हैं।

यह पहली बार नहीं है जब सोरेन सरकार ने ऐसा चौंकाने वाला कदम उठाया है; इससे पहले अनुराग गुप्ता को भी इसी तरह डीजीपी बनाया गया था, जिस पर भारी विवाद हुआ था। जानकार मानते हैं कि मुख्यमंत्री की ब्यूरोक्रेसी को लेकर यह शॉक ट्रीटमेंट की नीति भविष्य में भारी पड़ सकती है।

इस मामले को नई दिशा सुप्रीम कोर्ट के उस हालिया रुख से मिली है, जिसमें अदालत ने राज्यों द्वारा डीजीपी की नियुक्तियों में देरी करने और तदर्थ डीजीपी तैनात करने की प्रवृत्ति पर गहरी नाराजगी जताई है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि कई राज्यों में कार्यवाहक डीजीपी साल-दर-साल सेवा दे रहे हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का उल्लंघन है। कोर्ट ने अब यूपीएससी को यह अधिकार दे दिया है कि वह राज्यों को अनुपालन के लिए रिमाइंडर भेजे और आदेश न मानने पर अवमानना की कार्यवाही शुरू करे।

सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2018) मामले का हवाला देते हुए दोहराया कि राज्यों को डीजीपी की सेवानिवृत्ति से कम से कम तीन महीने पहले यूपीएससी को पात्र अधिकारियों के नाम भेजने चाहिए। आयोग इन नामों में से तीन वरिष्ठतम और अनुभवी अधिकारियों का एक पैनल तैयार करता है, जिनमें से किसी एक को राज्य सरकार को ‘तत्काल’ नियुक्त करना होता है। डीजीपी के लिए न्यूनतम दो वर्ष का कार्यकाल भी अनिवार्य किया गया है।

झारखंड के संदर्भ में, तदाशा मिश्रा की नियुक्ति इन मानदंडों पर खरी उतरती है या नहीं, यह यूपीएससी की अगली कार्रवाई पर निर्भर करेगा। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या हेमंत सोरेन अपने चिर-परिचित अंदाज में कोई नया चौंकाने वाला निर्णय लेते हैं या फिर नियमों के अनुरूप वरिष्ठता का सम्मान करते हैं।