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NGT on Environment Protection: ‘पर्यावरण की कीमत पर विकास मंजूर नहीं’, NGT का बड़ा फैसला- निजी जमीन पर भी लागू होंगे कड़े नियम

भोपाल: निजी जमीन का हवाला देकर पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी नहीं की जा सकती. इसको लेकर नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. एनजीटी ने जलस्रोतों, हरित क्षेत्रों और संवेदनशील इलाकों में हो रहे अवैध निर्माण और अन्य गतिविधियों पर सख्त रुख अपनाते हुए कई स्थानों पर रोक लगा दी है. एनजीटी का कहना है कि पर्यावरण की कीमत पर विकास की मंजूरी नहीं दी जा सकती है.

कैचमेंट एरिया में हो रहा हस्तक्षेप गंभीर

एनजीटी के समक्ष आए मामलों में पाया गया कि कई जगहों पर निजी स्वामित्व की जमीन होने का तर्क देकर खनन, निर्माण और व्यावसायिक गतिविधियां की जा रही थीं. इस पर एनजीटी ने स्पष्ट कर दिया है कि पर्यावरण कानून सभी पर समान रूप से लागू होते हैं, चाहे निजी जमीन हो या सरकारी. एनजीटी ने खास तौर पर नदियों, तालाबों, जलाशयों और उनके कैचमेंट एरिया में हो रहे हस्तक्षेप को गंभीर माना है. इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की गतिविधि से पहले पर्यावरणीय स्वीकृति अनिवार्य बताई गई है.

दोषियों से होगी पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई

एनजीटी ने संबंधित जिलों के कलेक्टर, नगर निगम और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्देश दिए हैं कि वे प्रतिबंधित क्षेत्रों में चल रही गतिविधियों की जांच करें और नियमों का उल्लंघन पाए जाने पर तत्काल कार्रवाई करें. एनजीटी ने चेतावनी देते हुए कहा है कि आदेशों की अवहेलना करने वालों पर भारी जुर्माना और कानूनी कार्रवाई हो सकती है. साथ ही, पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई भी दोषियों से कराई जाएगी.

वेटलैंड रुल्स 2017 का हो रहा उल्लंघन

इस मामले में शिकायतकर्ता राशिद नूर खान ने बताया कि “भोपाल के ग्राम महुआखेड़ा स्थित केरवा डैम के फुल टैंक लेवल और आसपास के क्षेत्र में 2000 से अधिक डंपरों से कोपरा, मुर्रम और काली मिट्टी डाली गई है. इसका उद्देश्य जलाशय और उसके कैचमेंट क्षेत्र को समतल कर भविष्य में प्लॉटिंग और निर्माण गतिविधियां करना बताया गया है. जो वेटलैंड नियम 2017 और पर्यावरण कानूनों का सीधा उल्लंघन है.”

संयुक्त समिति की रिपोर्ट से हुआ खुलासा

एनजीटी द्वारा गठित संयुक्त समिति ने स्थल निरीक्षण में पाया कि फुल टैंक लेवल की चिन्हांकित सीमा के भीतर करीब 10 फीट तक कोपरा से अवैध भराव किया गया है. इससे डैम की जल भंडारण क्षमता, संरचनात्मक सुरक्षा और पारिस्थितिकी को गंभीर खतरा बताया गया. समिति ने यह भी स्पष्ट किया कि निजी भूमि पर किया गया भराव भी सीधे जल निकाय को प्रभावित कर रहा है. एनजीटी ने स्पष्ट कहा कि भूमि का निजी होना पर्यावरणीय उल्लंघन को वैध नहीं बनाता. 33 मीटर बफर जोन के उल्लंघन को स्वीकार करते हुए मिट्टी और कोपरा हटाने के नोटिस को सही ठहराया गया.

सख्त निर्देश और निगरानी के आदेश

एनजीटी ने जल संसाधन विभाग को एफटीएल क्षेत्र की नियमित निगरानी, जिला प्रशासन को अतिक्रमण हटाने और राज्य वेटलैंड प्राधिकरण को 2 माह में जोन आफ इंफ्लुएंस चिन्हित करने के निर्देश दिए हैं. साथ ही, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सतत निगरानी के आदेश दिए गए हैं. एनजीटी ने कहा कि स्वच्छ पर्यावरण संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार है.