पिघलती बर्फ और मानवता के लिए रेड अलर्ट
जेनेवाः आज तड़के जारी हुई आर्कटिक रिपोर्ट कार्ड 2026 ने जलवायु वैज्ञानिकों और वैश्विक नीति-निर्माताओं के बीच हड़कंप मचा दिया है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि उत्तरी ध्रुव अब केवल गर्म नहीं हो रहा, बल्कि अपनी भौगोलिक पहचान खोने की कगार पर है। पिछले 150 वर्षों के रिकॉर्ड को तोड़ते हुए, बर्फ पिघलने की यह अभूतपूर्व दर पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन को अपरिवर्तनीय रूप से बदल रही है।
रिपोर्ट का सबसे डरावना हिस्सा पर्माफ्रॉस्ट यानी सदियों से जमी हुई मिट्टी का पिघलना है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इसके पिघलने से भारी मात्रा में दबी हुई मीथेन गैस वायुमंडल में लीक हो रही है। मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में अल्पकाल में 80 गुना अधिक ऊष्मा सोखती है।
मीथेन के उत्सर्जन से तापमान बढ़ता है, जिससे और अधिक बर्फ पिघलती है, जो बदले में और अधिक मीथेन छोड़ती है। यह एक ऐसा आत्म-विनाशकारी चक्र है जिसे रोकना वर्तमान तकनीक के साथ अत्यंत कठिन है। आर्कटिक की बर्फ का पिघलना केवल ध्रुवीय भालुओं की समस्या नहीं है। समुद्र का स्तर बढ़ने से दुनिया के सबसे घने बसे शहर अब सीधे खतरे में हैं।
समुद्र स्तर में मामूली वृद्धि भी दक्षिण मुंबई के निचले इलाकों को जलमग्न कर सकती है। न्यूयॉर्क और शंघाई शहरों के बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर के नुकसान की आशंका है। इसके साथ ही, आर्कटिक की ठंडी और मीठी धाराओं के महासागरीय परिसंचरण में मिलने से यूरोप में भीषण सर्दी और अमेरिका में विनाशकारी तूफानों जैसी एक्सट्रीम वेदर घटनाओं की आवृत्ति बढ़ गई है।
जैसे-जैसे बर्फ कम हो रही है, उत्तरी समुद्री मार्ग व्यावसायिक जहाजों के लिए खुल रहे हैं। इससे यात्रा का समय तो घटेगा, लेकिन रूस और अमेरिका के बीच इस क्षेत्र के विशाल तेल, गैस और खनिज संसाधनों पर कब्जे की होड़ तेज हो गई है। इसे नया शीत युद्ध कहा जा रहा है, जो पर्यावरण सुरक्षा के बजाय सैन्य शक्ति प्रदर्शन का केंद्र बनता जा रहा है। पर्यावरणविदों का स्पष्ट संदेश है: यदि हमें पेरिस समझौते के 1.5 डिग्री सेल्सियस के लक्ष्य को बचाना है, तो अगले एक दशक में हमें अपने कार्बन उत्सर्जन को शून्य की ओर ले जाना होगा। आर्कटिक रिपोर्ट कार्ड 2026 महज़ एक रिपोर्ट नहीं, बल्कि प्रकृति की अंतिम चेतावनी है।