चुनाव प्रचार में टाटा बाय बाय के बीच चल रहा खेल
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दलों का पर्दे के पीछे का खेल
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नामांकन और शक्ति प्रदर्शन
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एक दल के कई प्रत्याशी खड़े
राष्ट्रीय खबर
रांची की सड़कों पर इन दिनों सियासी शोर अपने शबाब पर है। नगर निकाय चुनाव (2026) के नामांकन का शोर और उम्मीदवारों का जमघट राजधानी के हर चौराहे पर एक अलग ही दृश्य पेश कर रहा है। बुधवार, 4 फरवरी को नामांकन की अंतिम तिथि होने के कारण समाहरणालय में जो गहमागहमी दिखी, उसने यह साफ कर दिया कि यह चुनाव केवल स्थानीय नहीं, बल्कि साख की लड़ाई बन चुका है। यूं तो राज्य निर्वाचन आयोग ने इन चुनावों को गैर-दलीय आधार पर कराने का निर्देश दिया है, लेकिन हकीकत इसके उलट है। रांची नगर निगम की गद्दी हथियाने के लिए राजनीतिक दलों ने अपने ‘समर्थित’ उम्मीदवारों को मैदान में उतार दिया है।
भाजपा ने रोशनी खलखो को अपना समर्थन दिया है, जिन्होंने निकाय चुनाव समय पर कराने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी थी। वहीं, कांग्रेस और झामुमो गठबंधन ने पूर्व मेयर रमा खलखो पर दांव लगाया है। इस बार मुकाबला रोचक है क्योंकि मैदान में दो खलखो आमने-सामने हैं। रमा खलखो जहां अपने अनुभव और पुराने कार्यकाल की उपलब्धियों को भुना रही हैं, वहीं रोशनी खलखो अदालती जीत और नए चेहरे के रूप में उभरी हैं।
नामांकन केंद्रों के बाहर का नजारा किसी त्यौहार से कम नहीं था। ढोल-नगाड़ों की थाप और समर्थकों के हाथ में लहराते झंडों ने कचहरी चौक और आसपास की सड़कों पर यातायात की रफ्तार रोक दी। वार्ड 18 के उम्मीदवार बबलू मुंडा गाजे-बाजे के साथ पहुंचे, तो वार्ड 34 में नामांकन पत्रों की सर्वाधिक बिक्री ने मुकाबले को बहुकोणीय बना दिया।
प्रत्याशियों ने नामांकन के साथ ही स्थानीय मुद्दों—जैसे पानी की किल्लत, सीवरेज सिस्टम और कचरा प्रबंधन—को चुनावी हथियार बनाना शुरू कर दिया है। मजेदार बात यह है कि नामांकन के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र लेने के चक्कर में रांची नगर निगम के खजाने में लाखों रुपये का टैक्स भी जमा हो गया है।
दलों के अंदरूनी समीकरण भी कम पेचीदा नहीं हैं। कई वार्डों में एक ही दल के दो-दो नेता अपनी दावेदारी ठोक रहे हैं। आधिकारिक समर्थन न मिलने के बावजूद कई बागी उम्मीदवार निर्दलीय के रूप में अपनी ताकत दिखा रहे हैं, जो मुख्य समर्थित उम्मीदवारों के लिए सिरदर्द बन सकते हैं।
23 फरवरी को होने वाले मतदान के लिए अब बिसात बिछ चुकी है। जहां भाजपा अपनी सांगठनिक एकजुटता के साथ मैदान में है, वहीं कांग्रेस-झामुमो गठबंधन सरकार की योजनाओं के दम पर वोट मांग रहा है। अब देखना यह है कि रांची की जनता अनुभव को चुनती है या बदलाव को।