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क्या देश में हिंदुत्व का नारा असर खोने लगा है

सेल्फ गोल दागने का भाजपा की राजनीतिक चाल क्यों

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी हालिया नियमों ने एक नया विवाद खड़ा कर दिया है। आलोचकों और विशेषज्ञों का मानना है कि ये दिशानिर्देश न केवल शैक्षणिक संस्थानों के माहौल को प्रभावित करेंगे, बल्कि यह उस हिंदुत्व की वैचारिक विफलता को भी दर्शाता है जिसे वर्तमान सरकार आगे बढ़ाने का दावा करती है। नए दिशानिर्देशों के खिलाफ सामान्य श्रेणी के छात्रों में भारी आक्रोश देखा जा रहा है। विरोध का मुख्य कारण इन नियमों में निहित कुछ विशिष्ट प्रावधान हैं।

आरोप है कि ये दिशानिर्देश सामान्य श्रेणी के छात्रों को भेदभाव विरोधी प्रावधानों के दायरे से बाहर रखते हैं। विशेषज्ञों का तर्क है कि इन नियमों में झूठे आरोपों के खिलाफ पर्याप्त सुरक्षा उपायों की कमी है, जिससे परिसरों में आपसी अविश्वास बढ़ सकता है। एक तरफ बटेंगे तो कटेंगे और एक हैं तो सेफ हैं जैसे नारे दिए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर ऐसे प्रशासनिक कदम जातियों के बीच संघर्ष को बढ़ावा दे सकते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, यह संकट केवल प्रशासनिक चूक नहीं है, बल्कि एक गहरी संस्थागत विफलता है। हिंदू धर्म में सुधार के विचारों की कमी नहीं है, लेकिन आधुनिक काल में उन संस्थानों का अभाव है जो जमीनी स्तर पर इन सुधारों को लागू कर सकें। जैसा कार्य सदियों पहले आदि शंकराचार्य ने संस्थागत रूप में किया था, वर्तमान हिंदुत्व प्रेरित सरकार उस स्तर का ढांचा खड़ा करने में विफल रही है। केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि या तो वे इन दिशानिर्देशों के परिणामों को समझ नहीं पाए, या फिर वे इस प्रक्रिया में मूक दर्शक बने रहे।

यह सर्वमान्य सत्य है कि समाज और परिसरों में भेदभाव आज भी मौजूद है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या सामान्य श्रेणी को हाशिए पर रखकर या तराजू को एक तरफ झुकाकर इस भेदभाव को समाप्त किया जा सकता है? जानकारों का मानना है कि भेदभाव विरोधी कानून समावेशी होने चाहिए। यदि किसी एक वर्ग को सुरक्षा से वंचित रखा जाता है, तो यह सामाजिक समरसता के बजाय जाति संघर्ष को जन्म देता है। रिपोर्ट बताती है कि ये दिशानिर्देश अचानक नहीं आए, बल्कि यह उस सोच का परिणाम हैं जो वास्तविक जमीनी सुधारों के बजाय केवल प्रतीकात्मक और प्रशासनिक बदलावों पर निर्भर है। उधर सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक भी लगा दी है, जो भाजपा के लिए सेल्फ गोल दागने जैसा है।

यूजीसी का यह सेल्फ-गोल यह याद दिलाता है कि राजनीतिक नारे और प्रशासनिक नीतियां जब एक-दूसरे के विपरीत दिशा में काम करती हैं, तो नुकसान अंततः समाज और देश की शैक्षणिक व्यवस्था का होता है। हिंदुत्व को यदि अपनी सार्थकता सिद्ध करनी है, तो उसे केवल राजनीतिक लाभ के बजाय न्यायपूर्ण संस्थागत सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना होगा।