Breaking News in Hindi

चुनाव आयोग की चूक से लाखों मतदाता परेशान

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से असली गड़बड़ी पकड़ में आ गयी

  • बीएलओ के पास सुधार का अधिकार नहीं

  • साफ्टवेयर की खामी अभी उजागर हो गयी

  • आयोग की तकनीकी विश्वसनीयता पर सवाल

राष्ट्रीय खबर

कोलकाताः पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के दौरान चुनाव आयोग के सॉफ्टवेयर की एक बड़ी विफलता सामने आई है। नाम, आयु और पारिवारिक विवरण पूरी तरह सही होने के बावजूद लाखों मतदाताओं के नाम संदिग्ध श्रेणी में डाल दिए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद जब अनमैप्ड और लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी इन मैपिंग से संबंधित सूचियां सार्वजनिक हुईं, तो चुनावी व्यवस्था की तकनीकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

तथ्यात्मक गड़बड़ियां और सॉफ्टवेयर का अजीब गणित इस तकनीकी गड़बड़ी का शिकार केवल आम लोग ही नहीं, बल्कि वे मतदाता भी हुए हैं जिनके दस्तावेज दशकों से त्रुटिहीन रहे हैं। यादवपुर विधानसभा क्षेत्र के 56 वर्षीय सुभाशीष साहु का मामला इसका प्रमाण है। उन्होंने फॉर्म में अपनी दादी का नाम बतौर रिश्तेदार दर्ज किया था। 2002 में उनकी दादी की आयु 83 वर्ष थी, जो 2025 में 106 वर्ष होनी चाहिए। नियमानुसार पोते और दादी के बीच 50 वर्ष का अंतर स्पष्ट है, लेकिन आयोग के सॉफ्टवेयर ने दावा किया कि यह अंतर 40 वर्ष से कम है और उनके नाम को संदिग्ध घोषित कर दिया।

इसी तरह मेदिनीपुर के सुब्रत बेरा का नाम 2002 और 2025 की सूची में हूबहू एक ही वर्तनी में होने के बाद भी संदिग्ध श्रेणी में है। आयोग ने पहले स्पष्ट किया था कि यदि एक व्यक्ति के छह पिता दिखाए जाते हैं, तो उसे लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी (तार्किक विसंगति) माना जाएगा। परंतु वास्तविकता यह है कि चार बच्चों के पिता के नाम भी इस सूची में शामिल हैं। सूत्रों के अनुसार, पूरे राज्य में लगभग 5 लाख मतदाता इस सॉफ्टवेयर ट्रैप का शिकार हुए हैं।

प्रशासनिक लाचारी और मतदाताओं की परेशानी सबसे बड़ी समस्या यह है कि चुनावी पंजीकरण अधिकारियों के पास इन स्पष्ट मानवीय या सॉफ्टवेयर त्रुटियों को सुधारने का कोई सीधा अधिकार नहीं है। अधिकारियों ने स्वीकार किया है कि वे आँखों से देख सकते हैं कि डेटा सही है, लेकिन सॉफ्टवेयर उसे एरर के रूप में रिजेक्ट कर रहा है। मतदाताओं को बीएलओ के पास से कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिल रहा है। उन्हें बस इतना कहा जा रहा है कि यदि सुनवाई का नोटिस आता है, तो उन्हें उपस्थित होना होगा।

राजनीतिक और न्यायिक पहलू विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों का आरोप है कि आयोग इन गड़बड़ियों को छिपाने के लिए सूचियों को सार्वजनिक करने में आनाकानी कर रहा था। सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख के बाद जब आंकड़े सामने आए, तो आयोग की कार्यप्रणाली पर उंगलियां उठने लगीं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सॉफ्टवेयर की इन खामियों को तुरंत ठीक नहीं किया गया, तो आगामी चुनावों में लाखों वैध मतदाता अपने मताधिकार से वंचित रह सकते हैं या उन्हें अनावश्यक प्रशासनिक प्रक्रियाओं से गुजरना होगा।