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अहमद अल-शारा ने पुतिन से की मुलाकात

आतंकवाद छोड़कर अब कूटनीति के मोर्चे पर सक्रियता

मॉस्को: सीरिया में सत्ता परिवर्तन के बाद वैश्विक राजनीति का केंद्र अब मॉस्को बन गया है। सीरिया के नए राष्ट्रपति अहमद अल-शारा ने बुधवार को रूस की राजधानी पहुँचकर क्रेमलिन में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ एक अत्यंत महत्वपूर्ण और संवेदनशील बैठक की।

बशर अल-असद के 24 साल पुराने शासन के पतन के बाद यह पहला मौका है जब सीरिया के नए नेतृत्व ने रूस के साथ सीधे तौर पर भविष्य के संबंधों की रूपरेखा पर चर्चा की है। रूस के लिए यह बैठक किसी अस्तित्व की लड़ाई से कम नहीं है। पिछले 14 वर्षों के भीषण गृहयुद्ध के दौरान, रूस ने असद सरकार को सैन्य और कूटनीतिक सुरक्षा प्रदान की थी।

बदले में, रूस को सीरिया में दो अत्यंत महत्वपूर्ण रणनीतिक ठिकाने मिले थे। टार्टस नौसैनिक अड्डा भूमध्य सागर में रूस का एकमात्र रसद केंद्र और बंदरगाह है, जो इसे यूरोप और मध्य पूर्व के समुद्री रास्तों पर नियंत्रण देता है।

हेमिमिम वायु सेना अड्डा से रूस पूरे क्षेत्र में हवाई अभियान चलाने और अपनी सैन्य शक्ति का प्रदर्शन करने की क्षमता रखता है। असद के पतन के बाद, इन अड्डों का भविष्य अधर में लटक गया था। मॉस्को को डर था कि नई विद्रोही ताकतें रूसी सेना को देश छोड़ने का आदेश दे सकती हैं, जिससे मध्य पूर्व में रूस का दशकों पुराना प्रभाव रातों-रात खत्म हो सकता है।

बैठक के दौरान व्लादिमीर पुतिन का रुख काफी नपा-तुला रहा। उन्होंने सीरिया की नई सरकार की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने की बात कही। पुतिन जानते हैं कि अब वे असद के रक्षक के रूप में नहीं, बल्कि एक सहयोगी के रूप में ही सीरिया में बने रह सकते हैं।

दूसरी ओर, राष्ट्रपति अहमद अल-शारा ने व्यावहारिक कूटनीति का परिचय दिया। उन्होंने संकेत दिया कि सीरिया का नया प्रशासन रूस के साथ सुरक्षा सहयोग जारी रखने के खिलाफ नहीं है, लेकिन इसकी कुछ शर्तें होंगी। शारा ने स्पष्ट किया कि किसी भी विदेशी सैन्य उपस्थिति को सीरिया के राष्ट्रीय हितों और नए प्रशासन की नीतियों के अनुकूल होना होगा। यह बयान दर्शाता है कि नया सीरिया अब रूस की कठपुतली बनकर नहीं रहना चाहता, बल्कि एक समान भागीदार के रूप में संबंध बनाना चाहता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि रूस को सीरिया में अपने पैर जमाए रखने के लिए अब भारी कूटनीतिक रियायतें देनी पड़ेंगी। इस समझौते का असर केवल इन दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा। यदि रूस अपने सैन्य अड्डे सुरक्षित रखने में सफल होता है, तो वह मध्य पूर्व में एक प्रमुख खिलाड़ी बना रहेगा। यदि वार्ता विफल होती है, तो यह तुर्की, ईरान और अमेरिका जैसे अन्य क्षेत्रीय खिलाड़ियों के लिए नए अवसर पैदा करेगा।

शारा के लिए, रूस के साथ संबंध बनाए रखना अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त करने और देश के पुनर्निर्माण में सहायता प्राप्त करने का एक जरिया हो सकता है। वहीं, पुतिन के लिए यह अपनी ग्रेट पावर वाली छवि को बचाने की कोशिश है। आने वाले हफ्तों में होने वाले तकनीकी स्तर के समझौते यह तय करेंगे कि रूसी सैनिक टार्टस और हेमिमिम में बने रहेंगे या उन्हें बोरिया-बिस्तर समेटना होगा।