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कैट के खिलाफ खड़ा हो गया यूपीएससी

पश्चिम बंगाल में डीजीपी नियुक्ति पर कानूनी संग्राम

राष्ट्रीय खबर

कोलकाता: पश्चिम बंगाल के अगले पुलिस महानिदेशक की नियुक्ति का मामला संघ लोक सेवा आयोग और केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण के बीच एक खींचतान में बदल गया है। वर्तमान कार्यवाहक डीजीपी राजीव कुमार 31 जनवरी 2026 को सेवानिवृत्त होने वाले हैं, लेकिन उनके उत्तराधिकारी के चयन की प्रक्रिया कानूनी बारीकियों में उलझी हुई है।

इस कानूनी जंग की शुरुआत वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी राजेश कुमार की याचिका से हुई। उन्होंने कैट में शिकायत दर्ज कराई कि यूपीएससी की प्रक्रियात्मक देरी और अनियमितताओं के कारण उन्हें डीजीपी पद के लिए विचार किए जाने के उचित अवसर से वंचित किया जा रहा है।

दरअसल, राज्य सरकार ने जुलाई 2025 में 10 वरिष्ठ अधिकारियों की सूची यूपीएससी को भेजी थी। हालांकि, यूपीएससी ने इस पैनल को यह कहते हुए लौटा दिया कि राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश का पालन नहीं किया, जिसके तहत मौजूदा डीजीपी की सेवानिवृत्ति से कम से कम तीन महीने पहले प्रस्ताव भेजना अनिवार्य है।

यूपीएससी ने महान्यायवादी की राय का हवाला देते हुए कहा कि इतनी अधिक देरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और राज्य को सुप्रीम कोर्ट से निर्देश मांगना चाहिए। हाल ही में कैट ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए यूपीएससी के निर्देशों को दरकिनार कर दिया।

प्राधिकारण ने कहा कि पदोन्नति के लिए विचार किया जाना एक मौलिक अधिकार है और राज्य सरकार की देरी का खामियाजा पात्र अधिकारियों को नहीं भुगतना चाहिए। न्यायाधिकरण ने निम्नलिखित समयसीमा तय की। 23 जनवरी: राज्य सरकार को यूपीएससी को नया पैनल भेजना था (जो सरकार ने भेज दिया है)। 28 जनवरी: यूपीएससी को एम्पैनलमेंट कमेटी की बैठक करनी थी। 29 जनवरी: यूपीएससी को तीन अधिकारियों के नामों की सिफारिश राज्य सरकार को भेजनी थी।

ताजा जानकारी के अनुसार, यूपीएससी ने कैट के इस आदेश को दिल्ली उच्च न्यायालय में चुनौती दी है, जिससे 31 जनवरी से पहले नए डीजीपी की नियुक्ति पर फिर से अनिश्चितता के बादल छा गए हैं।

31 जनवरी को न केवल कार्यवाहक डीजीपी राजीव कुमार, बल्कि राजेश कुमार और रणवीर कुमार जैसे अन्य वरिष्ठ अधिकारी भी सेवानिवृत्त हो रहे हैं। यदि 29 जनवरी तक अंतिम निर्णय नहीं होता है, तो राज्य सरकार को एक बार फिर से कार्यवाहक व्यवस्था का सहारा लेना पड़ सकता है, जो सुप्रीम कोर्ट के प्रकाश सिंह मामले के फैसले की भावना के विपरीत होगा। विपक्ष ने आरोप लगाया है कि राज्य सरकार अपने पसंदीदा अधिकारी को पद पर बनाए रखने के लिए प्रक्रिया में जानबूझकर देरी कर रही है, जबकि सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया है।