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पूर्व प्रधानमंत्री नूरी अल-मलिकी सत्ता की दौड़ में

इराक में राजनीतिक हलचल फिर से तेज हो गयी

बगदाद: इराक के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक गठबंधन कोऑर्डिनेशन फ्रेमवर्क ने शनिवार को एक बड़ा फैसला लेते हुए पूर्व प्रधानमंत्री नूरी अल-मलिकी को प्रधानमंत्री पद के लिए अपना आधिकारिक उम्मीदवार घोषित किया है। यह घोषणा उस समय हुई है जब कार्यवाहक प्रधानमंत्री मोहम्मद शिया अल-सुदानी ने, जिनके गुट ने नवंबर के संसदीय चुनावों में सर्वाधिक सीटें जीती थीं, इस महीने की शुरुआत में पद से हटने का फैसला किया। अल-सुदानी के हटने से अल-मलिकी के लिए रास्ता साफ हो गया है, क्योंकि ये दोनों नेता शिया पार्टियों के इस शक्तिशाली गठबंधन का समर्थन हासिल करने के लिए होड़ में थे।

इराकी संविधान के अनुसार, सबसे पहले संसद द्वारा राष्ट्रपति का चुनाव किया जाता है। इसके बाद राष्ट्रपति प्रधानमंत्री को नामित करता है, जिसे एक नई सरकार बनाने और मंत्रिमंडल गठित करने की जिम्मेदारी सौंपी जाती है। कोऑर्डिनेशन फ्रेमवर्क ने संसद से जल्द ही सत्र बुलाकर राष्ट्रपति चुनाव संपन्न कराने का आह्वान किया है। गठबंधन ने अल-मलिकी के नामांकन के पीछे उनके व्यापक राजनीतिक और प्रशासनिक अनुभव को मुख्य आधार बताया है।

नूरी अल-मलिकी का इतिहास इराक की राजनीति में काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। वह पहली बार 2006 में प्रधानमंत्री बने थे और 2003 में सद्दाम हुसैन के पतन के बाद से वह एकमात्र ऐसे नेता हैं जिन्होंने प्रधानमंत्री के रूप में लगातार दो कार्यकाल पूरे किए। हालांकि, उनका तीसरा कार्यकाल विवादों की भेंट चढ़ गया था। उन पर सत्ता के केंद्रीकरण और सुन्नी व कुर्द अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेलने के आरोप लगे थे, जिसके कारण देश में भारी असंतोष पैदा हुआ था।

अल-मलिकी का दोबारा नामांकन इराक में ध्रुवीकरण पैदा कर सकता है। सुन्नी पार्टियों के गठबंधन नेशनल पॉलिटिकल काउंसिल ने एक कड़े बयान में चेतावनी दी है कि उन नेताओं को दोबारा सत्ता में लाना खतरनाक हो सकता है जिनके पिछले अनुभव स्थिरता लाने में विफल रहे हैं। दूसरी ओर, सुन्नी समुदाय के ही एक अन्य प्रभावशाली अज़्म एलायंस ने इस रुख को खारिज करते हुए अल-मलिकी का समर्थन किया है। यह फूट दर्शाती है कि इराक का राजनीतिक परिदृश्य कितना जटिल और विभाजित है।

नई सरकार के सामने अमेरिका और ईरान के बीच संतुलन बनाए रखने की कठिन चुनौती होगी। वाशिंगटन लगातार दबाव बना रहा है कि इराक ईरान समर्थित सशस्त्र समूहों को निरस्त्र करे। यह काम आसान नहीं है, क्योंकि इन समूहों के पास बड़ी राजनीतिक शक्ति है। साथ ही, पड़ोसी देश सीरिया में अस्थिरता के कारण इस्लामिक स्टेट के पुनरुत्थान का डर भी बना हुआ है। हाल ही में अमेरिकी सेना ने सीरिया से करीब 9,000 IS कैदियों को इराक के केंद्रों में स्थानांतरित करना शुरू कर दिया है, जिससे सुरक्षा संबंधी चिंताएं और बढ़ गई हैं।