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आदिवासी परिषद ने कहा जबरन दबाव डाल रहा प्रशासन

विशाल विकास परियोजनाओं के प्रस्ताव पर नया विवाद खड़ा

निकोबरः ग्रेट निकोबार द्वीप पर प्रस्तावित 92,000 करोड़ रुपये की मेगा-इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजना को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। निकोबार ट्राइबल काउंसिल (जनजातीय परिषद) के सदस्यों ने आरोप लगाया है कि जिला प्रशासन उन पर अपनी पैतृक भूमि छोड़ने के लिए एक सरेंडर सर्टिफिकेट पर हस्ताक्षर करने का भारी दबाव बना रहा है। 22 जनवरी, 2026 को एक ऑनलाइन प्रेस ब्रीफिंग के दौरान जनजातीय परिषद के अध्यक्ष बरनबास मंजू और अन्य सदस्यों ने बताया कि 7 जनवरी को हुई एक बैठक में अधिकारियों ने उन्हें मौखिक रूप से अपनी पैतृक जमीनें सौंपने को कहा।

निकोबारी समुदाय के लोग 2004 की सुनामी से पहले गैलाथिया बे, पेमाया बे और नंजप्पा बे जैसे क्षेत्रों में रह रहे थे। सुनामी के 21

साल बाद भी वे अपने मूल गांवों में लौटने का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन अब प्रशासन उसी जमीन को विकास परियोजना के लिए मांग रहा है। अधिकारियों ने जनजातीय प्रतिनिधियों को एक व्हाट्सएप भी भेजा, जिसमें मुख्य सचिव को संबोधित करते हुए जमीन सरेंडर करने का प्रारूप था। जब परिषद ने विरोध किया, तो प्रशासन ने एक समझौता प्रस्ताव रखा। इसमें कहा गया कि यदि आदिवासी गैलाथिया बे की जमीन छोड़ देते हैं, तो उन्हें पश्चिमी तट के कुछ अन्य गांवों में फिर से बसने की अनुमति दी जा सकती है।

पुलोभाबी गांव के प्रथम कैप्टन टाइटस पीटर ने भावुक होते हुए कहा, हम इस तरह के समर्पण दस्तावेज पर हस्ताक्षर नहीं कर सकते। यह हमारी पैतृक जनजातीय भूमि है। यदि हम इसे दे देंगे, तो हमारी भविष्य की पीढ़ियों के पास कुछ नहीं बचेगा। परिषद का कहना है कि यह परियोजना उनके अस्तित्व और संस्कृति के लिए खतरा है।

ग्रेट निकोबार की इस परियोजना में एक अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, एक सैन्य-नागरिक हवाई अड्डा और एक टाउनशिप का निर्माण शामिल है। प्रशासन के अधिकारी फिलहाल इस मामले पर चुप्पी साधे हुए हैं, जबकि 28 जनवरी को एक और निर्णायक बैठक होने की संभावना है।