तमिलनाडु के बाद कर्नाटक में भी राज्यपाल का वही आचरण
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मुख्यमंत्री ने कहा संविधान का उल्लंघन हुआ
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सदन के भीतर राज्यपाल के खिलाफ नारेबाजी
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वीबी जी राम जी की निंदा से परहेज किया
राष्ट्रीय खबर
बेंगलुरुः कर्नाटक की राजनीति में गुरुवार को उस समय बड़ा संवैधानिक संकट खड़ा हो गया जब राज्यपाल थावरचंद गहलोत ने विधानमंडल के संयुक्त सत्र के पहले दिन अपने संबोधन की केवल दो पंक्तियां पढ़ीं और सदन से चले गए। 22 जनवरी, 2026 से शुरू हुए इस सत्र में राज्यपाल के इस कदम ने सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखे टकराव की स्थिति पैदा कर दी है।
इससे पहले तमिलनाडु में भी राज्यपाल रवि ने लगभग ऐसा ही आचरण किया था क्योंकि वह भी राज्य सरकार द्वारा तैयार भाषण पढ़ने को तैयार नहीं थे। आम तौर पर इस मौके पर दिया जाने वाला भाषण राज्य सरकार की अपनी उपलब्धियों पर ही आधारित होता है।
घटनाक्रम के अनुसार, कर्नाटक की कांग्रेस सरकार द्वारा राज्यपाल के लिए जो भाषण तैयार किया गया था, राज्यपाल ने उसके 11 पैराग्राफों पर कड़ी आपत्ति जताई थी। इन पैराग्राफों में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए वीबी जी राम जी अधिनियम की तीखी आलोचना की गई थी। राज्यपाल गहलोत ने इन अंशों को पढ़ने से इनकार कर दिया और केवल शुरुआती दो पंक्तियां पढ़कर अपना अभिभाषण समाप्त कर दिया।
राज्यपाल के इस व्यवहार पर मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कड़ी नाराजगी व्यक्त की है। मुख्यमंत्री ने इसे संविधान का उल्लंघन करार देते हुए कहा कि राज्यपाल का कर्तव्य सरकार द्वारा तैयार किए गए नीतिगत भाषण को पढ़ना है। सत्ता पक्ष के विधायकों ने सदन के भीतर भारी हंगामा किया और राज्यपाल के इस कदम को लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ बताया।
जैसे ही राज्यपाल सदन से बाहर निकले, विधानमंडल के भीतर भारी कोलाहल की स्थिति बन गई। कांग्रेस विधायकों ने राज्यपाल के खिलाफ नारेबाजी की, जबकि विपक्षी दलों ने सरकार के रुख की आलोचना की। यह विवाद अब केंद्र और राज्य के बीच शक्तियों के संतुलन और राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका पर एक नई बहस छेड़ चुका है।