देश में बदल रहा है सत्ता और शक्ति का संतुलन
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राज्य सरकारें भी बांह चढ़ाने लगी है
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ममता ने तो अपनी फाइल छीन ली
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रांची में ईडी के बचाव में आयी भाजपा
राष्ट्रीय खबर
रांची: भारत के राजनीतिक परिदृश्य में केंद्रीय जांच एजेंसियों, विशेषकर प्रवर्तन निदेशालय, की भूमिका को लेकर बहस अब एक नए और आक्रामक मोड़ पर पहुँच गई है। रांची में जमीन सौदे से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में जब झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी हुई थी, तब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इसे भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक निर्णायक प्रहार बताया था। हालांकि, समय बीतने के साथ इन कार्रवाइयों की कानूनी वैधता और एजेंसियों की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं।
हालिया घटनाक्रमों ने इस टकराव को और हवा दी है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का उदाहरण इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब ईडी ने कोलकाता में आई-पैक के कार्यालय पर छापेमारी की, तो मुख्यमंत्री स्वयं वहां पहुँच गईं। इसके बाद जो हुआ वह अभूतपूर्व था; ममता बनर्जी ईडी के कब्जे से उन दस्तावेजों को वापस ले आईं, जिन्हें वह अपनी पार्टी के प्रत्याशियों की सूची बता रही थीं।
मुख्यमंत्री ने सार्वजनिक रूप से एक हरे रंग की फाइल लहराते हुए दावा किया कि जांच एजेंसी राजनीतिक रणनीतियों को प्रभावित करने की कोशिश कर रही थी। इसके विपरीत, ईडी को रक्षात्मक रुख अपनाते हुए यह स्पष्टीकरण देना पड़ा कि उसने वहां से कुछ भी जब्त नहीं किया है। इस घटना ने एक बड़ा संदेश दिया कि राज्य सरकारें अब केवल मूकदर्शक बनकर केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई नहीं झेलेंगी।
झारखंड की राजधानी रांची में भी स्थिति बदलती नजर आ रही है। हिनू स्थित ईडी कार्यालय में झारखंड पुलिस की अचानक दस्तक इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अब केवल प्रिवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट का धौंस दिखाकर राज्य सरकारों को भयभीत करने का दौर समाप्त हो रहा है। हेमंत सोरेन के मामले में जब उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि प्रथम दृष्टया यह मामला बनता ही नहीं है, तो ईडी ने उस फैसले को तत्काल ऊपरी अदालत में चुनौती देने की हिम्मत भी नहीं दिखाई। यह तथ्य जांच की गंभीरता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
दिलचस्प बात यह है कि जब भी किसी राज्य की पुलिस ईडी कार्यालय या उसके अधिकारियों पर वैधानिक कार्रवाई करती है, तो भाजपा कार्यकर्ता और नेता तुरंत बचाव में उतर आते हैं, जिससे यह धारणा पुख्ता होती है कि एजेंसियों और सत्ताधारी दल के बीच कोई अदृश्य तालमेल है।
पिछले कुछ वर्षों का पैटर्न देखें तो ईडी अक्सर मीडिया को ऑफ द रिकॉर्ड जानकारियां प्रदान करती रही है। सूचनाएं लीक करने का यह तरीका अक्सर भाजपा नेताओं के माध्यम से अपनाया जाता है, जिससे जांच अधिकारी सीधे जवाबदेही से बच जाते हैं। उत्तर प्रदेश के इत्र कारोबारी के यहाँ हुई छापेमारी की तस्वीरें हों या ओडिशा में साहू खानदान के शराब व्यवसाय से मिले नोटों के ढेर की फोटो, इन सबका मीडिया तक पहुँचने का जरिया अक्सर राजनीतिक गलियारे ही रहे हैं।
लेकिन अब समय बदल रहा है। पश्चिम बंगाल से लेकर झारखंड तक, क्षेत्रीय दल और राज्य सरकारें अब विधिक और राजनीतिक, दोनों मोर्चों पर ईडी की चुनौतियों का डटकर मुकाबला कर रही हैं। भाजपा के पीछे छिपकर जांच करने का अवसर अब जांच एजेंसियों के हाथ से फिसलता नजर आ रहा है, जिससे उनकी साख और कार्यप्रणाली दोनों ही अब जनता की कड़ी अदालत में हैं।