उमर खालिद के जेल में होने पर बोले पूर्व सीजेआई
राष्ट्रीय खबर
जयपुरः जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल के दौरान आइडियाज ऑफ जस्टिस सत्र में पूर्व मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ ने भारतीय न्याय व्यवस्था के सबसे बुनियादी सिद्धांत पर जोर देते हुए कहा कि दोषसिद्धि से पहले जमानत मिलना एक अधिकार होना चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार वीर सांघवी के सवालों का जवाब देते हुए, उन्होंने विशेष रूप से उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे चर्चित मामलों के संदर्भ में न्यायपालिका की जिम्मेदारी और चुनौतियों पर अपनी बात रखी।
न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने आपराधिक कानून के उस मूल मंत्र को दोहराया जिसके अनुसार, जब तक अपराध सिद्ध न हो जाए, तब तक हर व्यक्ति निर्दोष है। उन्होंने बिना सजा के वर्षों तक जेल में बंद रहने वाले विचाराधीन कैदियों के मानवीय दर्द को रेखांकित किया। उन्होंने एक गंभीर सवाल उठाया—यदि कोई व्यक्ति पांच या सात साल तक जेल में रहता है और अंत में निर्दोष साबित होता है, तो समाज उसके खोए हुए वर्षों की भरपाई कैसे करेगा?
उन्होंने स्पष्ट किया कि कानून के अनुसार केवल तीन स्थितियों में ही जमानत रोकी जानी चाहिए। यदि आरोपी के रिहा होने पर फिर से अपराध करने की संभावना हो। यदि वह सबूतों के साथ छेड़छाड़ कर सकता हो। यदि उसके कानून की प्रक्रिया से भागने का डर हो।
उन्होंने कहा कि यदि ये तीनों आधार मौजूद नहीं हैं, तो जमानत देना अनिवार्य होना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों पर उन्होंने टिप्पणी की कि अदालतों को ऐसे मामलों की गहराई से जांच करनी चाहिए, न कि केवल राष्ट्रीय सुरक्षा शब्द के आधार पर लोगों को वर्षों तक जेल में रखना चाहिए।
पूर्व मुख्य न्यायाधीश ने निचली अदालतों (सत्र और जिला अदालतों) द्वारा नियमित रूप से जमानत अर्जी खारिज करने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि अक्सर अधीनस्थ न्यायाधीशों के मन में यह डर रहता है कि जमानत देने पर उनकी ईमानदारी पर सवाल उठाए जा सकते हैं। यही कारण है कि छोटे-छोटे जमानत के मामले भी अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच जाते हैं, जिससे न्यायिक प्रणाली पर बोझ बढ़ता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि त्वरित सुनवाई में देरी होने पर आरोपी जमानत पाने का संवैधानिक हकदार है।