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गौरी लंकेश की हत्या का अभियुक्त भी चुनाव जीता

जालना नगर निगम चुनाव में निर्दलीय की जीत पर चर्चा

राष्ट्रीय खबर

मुंबईः महाराष्ट्र के जालना नगर निकाय चुनाव के नतीजों ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींचा है। वर्ष 2017 में बेंगलुरु में हुई प्रख्यात पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता गौरी लंकेश की हत्या के मामले में आरोपी श्रीकांत पंगारकर ने जालना नगर निगम चुनाव में जीत हासिल की है।

पंगारकर ने यह जीत एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में दर्ज की है, जिसने भारतीय राजनीति में अपराधियों के प्रवेश और चुनावी नैतिकता पर एक नई बहस छेड़ दी है। शुक्रवार को घोषित परिणामों के अनुसार, श्रीकांत पंगारकर ने जालना के वार्ड नंबर 13 से चुनाव लड़ा था। उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी और भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार रावसाहेब धोबले को 2,621 मतों के अंतर से पराजित किया।

पंगारकर को कुल 5,145 वोट मिले, जबकि भाजपा प्रत्याशी को केवल 2,524 वोट प्राप्त हुए। दिलचस्प बात यह है कि मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने इस वार्ड में पंगारकर के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं उतारा था, जिसे राजनीतिक विश्लेषक एक मौन समर्थन के रूप में देख रहे हैं।

पंगारकर का राजनीति से पुराना नाता रहा है। वह 2001 से 2006 के बीच अविभाजित शिवसेना के टिकट पर जालना नगर परिषद के सदस्य रह चुके हैं। हालांकि, 2011 में टिकट न मिलने के बाद उन्होंने कट्टरपंथी संगठनों की ओर रुख किया और हिंदू जनजागृति समिति से जुड़ गए।

अगस्त 2018 में महाराष्ट्र एटीएस ने उन्हें विस्फोटक और हथियार रखने के आरोप में गिरफ्तार किया था, जिसमें उन पर यूएपीए जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई थीं। गौरी लंकेश हत्याकांड में साजिशकर्ताओं को रसद और वैचारिक समर्थन देने के आरोप में भी उनका नाम चार्जशीट में शामिल है।

उन्हें सितंबर 2024 में ही कर्नाटक उच्च न्यायालय से जमानत मिली थी। अपनी जीत के बाद पंगारकर ने समर्थकों के साथ जश्न मनाया और मीडिया से कहा कि जनता ने मेरे काम पर भरोसा जताया है। उन्होंने यह भी दावा किया कि गौरी लंकेश का मामला अभी विचाराधीन है और वे निर्दोष साबित होंगे।

विपक्ष ने इस जीत को लोकतंत्र के लिए एक काला दिन बताया है। कांग्रेस और अन्य सामाजिक संगठनों का कहना है कि एक जघन्य हत्याकांड के आरोपी का चुनाव जीतना समाज में बढ़ती कट्टरता और चुनावी प्रक्रिया की खामियों को उजागर करता है। अब सभी की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या निर्वाचित होने के बाद पंगारकर पर चल रहे कानूनी मामलों में तेजी आएगी या यह जीत उन्हें राजनीतिक कवच प्रदान करेगी।