मणिपुर की जातीय हिंसा की कड़ी में एक और दुखद अंत
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः मणिपुर की जातीय हिंसा के सबसे भयावह और विचलित करने वाले अध्यायों में से एक का अंत बेहद दुखद रूप से हुआ है। दो साल पहले उग्र भीड़ द्वारा अगवा की गई और सामूहिक बलात्कार का शिकार बनी एक कुकी समुदाय की महिला ने रविवार को दम तोड़ दिया। यह घटना न केवल मणिपुर के घावों को कुरेदती है, बल्कि न्याय की धीमी प्रक्रिया और पीड़ितों के मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
मई 2023 में जब मणिपुर में जातीय हिंसा भड़की थी, तब इस महिला को एक भीड़ ने जबरन उठा लिया था। उस समय की रिपोर्टों के अनुसार, उसे सार्वजनिक रूप से अपमानित किया गया और सामूहिक बलात्कार का शिकार बनाया गया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद देश भर में आक्रोश फैल गया था।
पीडिता के परिजनों के अनुसार, वह पिछले दो वर्षों से न केवल शारीरिक जटिलताओं से जूझ रही थी, बल्कि वह गंभीर पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर का भी शिकार थी। उचित चिकित्सा सहायता और पुनर्वास के प्रयासों के बावजूद, उसके शरीर और मन पर लगे गहरे घाव कभी नहीं भर सके। रविवार को इंफाल के एक राहत शिविर के पास उनकी स्थिति बिगड़ी और अस्पताल ले जाते समय उनकी मृत्यु हो गई।
इस मामले में मुख्य आरोपियों की गिरफ्तारी के बावजूद, मामला अब भी अदालती कार्यवाही के चक्रव्यूह में फंसा हुआ है। पीड़िता की मृत्यु ने कुकी-जो समुदायों के बीच एक बार फिर दुख और रोष की लहर पैदा कर दी है। जनजातीय संगठनों का कहना है कि वह केवल एक अपराध की शिकार नहीं थी, बल्कि वह राज्य की सुरक्षा व्यवस्था की विफलता का जीवित प्रमाण थी।
मणिपुर में मई 2023 से शुरू हुई हिंसा में अब तक 250 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और 60,000 से अधिक लोग विस्थापित हुए हैं। यह विशेष मामला अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बना था, जिसने भारत में महिला सुरक्षा और संघर्ष क्षेत्रों में मानवाधिकारों की स्थिति पर बहस छेड़ दी थी।
महिला की मृत्यु के बाद राज्य के संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा बढ़ा दी गई है ताकि किसी भी प्रकार की नई हिंसा को रोका जा सके। नागरिक समाज समूहों ने सरकार से मांग की है कि पीड़िता के परिवार को तुरंत मुआवजा दिया जाए और इस मामले के दोषियों को जल्द से जल्द कड़ी सजा दिलाई जाए ताकि दिवंगत आत्मा को न्याय मिल सके। यह घटना याद दिलाती है कि युद्ध और हिंसा में सबसे भारी कीमत महिलाओं को चुकानी पड़ती है, और उनके लिए ‘शांति’ का अर्थ केवल बंदूकों का रुकना नहीं, बल्कि न्याय और सम्मान की बहाली भी है।