Breaking News in Hindi
ब्रेकिंग
हजारीबाग में प्रमंडलीय खेल महोत्सव: 7 जिलों के 1300 खिलाड़ी लेंगे भाग, मैदान में बुनियादी सुविधाओं क... रांची में डॉक्टर से ₹5 करोड़ की रंगदारी मांगने वाला गिरफ्तार: जमीन सौदे के विवाद में दी थी जान से मा... रायपुर के गुढ़ियारी में मंदिर में तोड़फोड़ से तनाव: शिवजी, हनुमानजी और साईं बाबा की प्रतिमाएं खंडित;... सुकमा नवोदय विद्यालय की छात्रा की बिगड़ी तबीयत: इलाज के लिए दर-दर भटके परिजन, लिवर में सूजन और संक्र... दुर्ग नगर निगम में महापौर अलका बाघमार की इनोवा में लगी भीषण आग: चेंबर में जाते ही धू-धू कर जली गाड़ी... नेपाल की भोटेकोशी नदी में भीषण बाढ़ से तबाही: नेपाल में फंसे छत्तीसगढ़ के नागरिकों के लिए सरकार ने ज... कांकेर में भालुओं का भीषण आतंक: घरों में घुस रहे जंगली भालू, एक दरवाजे में लग रहे 7 ताले; 5 साल में ... बिलासपुर-बेंगलुरु साप्ताहिक एक्सप्रेस का नियमित परिचालन शुरू; रायपुर, दुर्ग, गोंदिया होकर चलेगी ट्रे... रायपुर सेंट्रल जेल: रक्षाबंधन पर बंदियों से मिल सकेंगी बहनें; 100 ग्राम मिठाई की अनुमति, मोबाइल-पर्स... रायपुर में ₹16 लाख के सरकारी राशन का गबन: जोरा में राशन दुकान संचालक टोपेश्वर साहू गिरफ्तार, 389 क्व...

गौमाता के नाम पर भी घोटाला हो गया मध्यप्रदेश में

पंचगव्य से कैंसर का इलाज में सरकारी धन स्वाहा

  • जांच रिपोर्ट में चौंकाने वाले खुलासे

  • बाजार मूल्य से अधिक खर्च किया

  • अनावश्यक हवाई यात्राएं भी हुई

राष्ट्रीय खबर

भोपाल: मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित नानाजी देशमुख पशु चिकित्सा विज्ञान विश्वविद्यालय में चल रही एक महत्वाकांक्षी शोध परियोजना अब जांच के घेरे में है। पंचगव्य (गाय के गोबर, मूत्र और दूध से बने उत्पाद) के माध्यम से कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज का दावा करने वाली इस परियोजना में करोड़ों रुपये की वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे हैं।

जिला प्रशासन द्वारा गठित जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट कलेक्टर को सौंप दी है। अतिरिक्त कलेक्टर रघुवर मरावी के नेतृत्व में हुई इस जांच में सामने आया कि परियोजना के लिए आवंटित 3.5 करोड़ रुपये का उपयोग नियमों के विरुद्ध किया गया है।

साल 2011 से 2018 के बीच गाय के गोबर, मूत्र, मिट्टी के बर्तनों और मशीनों पर 1.92 करोड़ रुपये खर्च दिखाए गए, जबकि जांच टीम के अनुसार इनका वास्तविक बाजार मूल्य मात्र 15-20 लाख रुपये के आसपास था। शोध के नाम पर गोवा और बेंगलुरु जैसे शहरों की 23-24 हवाई यात्राएं की गईं, जिनका मूल अनुमान में कोई उल्लेख नहीं था।

मूल योजना में वाहन खरीदने का प्रावधान नहीं था, फिर भी 7.5 लाख रुपये की कार खरीदी गई। इसके अलावा, ईंधन और रखरखाव पर 7.5 लाख और फर्नीचर व इलेक्ट्रॉनिक्स पर 15 लाख रुपये खर्च किए गए। किसानों को प्रशिक्षण देने के नाम पर फंड का उपयोग हुआ, लेकिन जांच में यह स्पष्ट नहीं हो सका कि असल में क्या और किसे ट्रेनिंग दी गई।

रिपोर्ट में यह भी रेखांकित किया गया है कि एक दशक से अधिक समय बीत जाने के बाद भी यह परियोजना कैंसर का कोई इलाज या ठोस शोध परिणाम देने में विफल रही है। शोध के नाम पर सार्वजनिक धन के इस तरह के उपयोग ने संस्थान की जवाबदेही पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।

हालांकि, विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन सभी आरोपों को सिरे से खारिज कर दिया है। रजिस्ट्रार डॉ. एसएस तोमर का कहना है कि परियोजना 2012 से चल रही है और सभी खरीदारी सरकारी नियमों और ओपन टेंडर के जरिए की गई है। ऑडिट रिपोर्ट और प्रमाण पत्र पहले ही भेजे जा चुके हैं और हमने जांच समिति को सभी दस्तावेज उपलब्ध करा दिए हैं। कोई घोटाला नहीं हुआ है। अतिरिक्त कलेक्टर की रिपोर्ट अब संभागीय आयुक्त को भेजी जाएगी, जिसके बाद प्रशासन इस मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई या गहन जांच का निर्णय लेगा।