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सोनम वांगचुक की हिरासत और दुर्भावना के आरोप

शीर्ष अदालत में सरकार की कारगुजारियों की पोल खुलने लगी है

राष्ट्रीय खबर

नईदिल्लीः प्रसिद्ध जलवायु कार्यकर्ता और लद्दाख को राज्य का दर्जा दिलाने के लिए अभियान चला रहे सोनम वांगचुक की हिरासत का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज पर है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पी.बी. वराले की पीठ के समक्ष इस मामले पर तीखी बहस हुई।

वांगचुक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने दलील दी कि उनकी हिरासत पूरी तरह से प्रशासनिक दुर्भावना से प्रेरित थी। सिब्बल ने अदालत को बताया कि स्थानीय अधिकारियों ने जानबूझकर वांगचुक के उन सार्वजनिक संदेशों और सोशल मीडिया पोस्ट को छिपाया, जिनमें उन्होंने हिंसा खत्म करने और शांति बनाए रखने की पुरजोर अपील की थी।

पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब लद्दाख को छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा और राज्य का दर्जा देने की मांग को लेकर हुए प्रदर्शनों ने हिंसक रूप ले लिया था। इस हिंसा के दो दिन बाद, 26 सितंबर 2025 को वांगचुक को राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत में ले लिया गया और उन्हें राजस्थान की जोधपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया।

कपिल सिब्बल ने अदालत में वांगचुक के शांति संदेशों के वीडियो चलाकर यह साबित करने की कोशिश की कि उनके मुवक्किल को गलत तरीके से हिंसा भड़काने वाला बताया गया। उन्होंने तर्क दिया कि यह स्थानीय अधिकारियों का कर्तव्य था कि वे हिरासत का आदेश देने वाले प्राधिकारी के सामने वांगचुक के पक्ष के साक्ष्य भी रखते, लेकिन जानबूझकर इसे नजरअंदाज किया गया।

इसके अतिरिक्त, सिब्बल ने हिरासत की प्रक्रियात्मक खामियों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धारा 8 के तहत, किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लिए जाने के अधिकतम 10 दिनों के भीतर उसे हिरासत के ठोस कारण बताए जाने चाहिए। हालाँकि, वांगचुक के मामले में उन्हें हिरासत के आधारों के बारे में पूरे 28 दिनों की अत्यधिक और अपमानजनक देरी के बाद सूचित किया गया। सिब्बल ने आरोप लगाया कि साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किए गए मुख्य वीडियो भी उन्हें सुनवाई से ठीक एक दिन पहले दिए गए, जिससे उन्हें अपना बचाव करने का उचित अवसर नहीं मिला।

वांगचुक की पत्नी गीतांजलि आंग्मो ने भी याचिका में आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार वांगचुक की उन सक्रियताओं से नाराज थी, जिसमें वे लद्दाख की स्वायत्तता और पर्यावरण सुरक्षा के लिए सरकार पर दबाव बना रहे थे। उन्होंने दावा किया कि अक्टूबर 2025 में होने वाले लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद के चुनावों से ठीक पहले वांगचुक और उनकी संस्थाओं के खिलाफ सीबीआई जांच, भूमि लीज रद्द करने और आयकर समन जैसी कार्रवाइयां अचानक शुरू कर दी गईं। सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को सुनने के बाद मामले की गंभीरता को देखते हुए अगली सुनवाई 12 जनवरी के लिए तय की है।