खनन परियोजनाओं के लिए मानदंडों में ढील क्यों
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः भारत की पर्यावरण नीति में हाल ही में किए गए एक महत्वपूर्ण बदलाव ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है। केंद्र सरकार ने अब गैर-कोयला खनन परियोजनाओं (जैसे लोहा, सोना, तांबा आदि) के लिए पर्यावरण मंजूरी भारत की पर्यावरण नीति में हाल ही में किए गए एक महत्वपूर्ण बदलाव ने राजनीतिक और सामाजिक हलकों में एक नई बहस छेड़ दी है।
केंद्र सरकार ने अब गैर-कोयला खनन परियोजनाओं (जैसे लोहा, सोना, तांबा आदि) के लिए पर्यावरण मंजूरी प्राप्त करने की प्रक्रिया को आसान बना दिया है। नए नियमों के अनुसार, अब डेवलपर्स को पर्यावरण मंजूरी के लिए आवेदन करते समय भूमि अधिग्रहण का कानूनी प्रमाण देना अनिवार्य नहीं होगा। पहले यह एक अनिवार्य शर्त थी, जिसका अर्थ था कि जब तक जमीन का मालिकाना हक सुनिश्चित नहीं हो जाता, तब तक पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती थी।
इस नीतिगत बदलाव पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने कड़ा विरोध जताया है। कांग्रेस महासचिव और पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला करते हुए इसे मोदी शासन द्वारा जिम्मेदार पर्यावरण शासन पर एक और प्रहार करार दिया है। उन्होंने अपने तर्क में इस बात पर जोर दिया कि भूमि के पूर्ण विवरण और उसके सटीक स्वामित्व के बिना किसी भी परियोजना के पर्यावरण प्रभाव आकलन की प्रक्रिया को वैज्ञानिक ढंग से पूरा करना असंभव है। उनके अनुसार, जब तक यह स्पष्ट नहीं होगा कि खनन किस विशिष्ट क्षेत्र में होना है, तब तक वहां के पारिस्थितिकी तंत्र, जल स्रोतों और स्थानीय आबादी पर पड़ने वाले प्रभावों का सही अनुमान कैसे लगाया जा सकता है?
दूसरी ओर, केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने इस कदम का बचाव करते हुए इसे विकासात्मक कार्यों में आने वाली व्यावहारिक कठिनाइयों का समाधान बताया है। मंत्रालय का तर्क है कि भूमि अधिग्रहण एक लंबी और जटिल प्रक्रिया है, जिसके कारण कई महत्वपूर्ण परियोजनाएं वर्षों तक अटकी रहती हैं। मंत्रालय द्वारा जारी कार्यालय ज्ञापन के अनुसार, यह निर्णय गैर-कोयला खनन विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति की सिफारिशों के बाद लिया गया है। समिति का मानना है कि भूमि अधिग्रहण को पर्यावरण मंजूरी से अलग करना तर्कसंगत है, क्योंकि कई मामलों में पर्यावरण मंजूरी मिलने के बाद भी भूमि अधिग्रहण का कार्य चरणों में चलता रहता है।
यह विवाद विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच के पुराने संघर्ष को फिर से उजागर करता है। जहां सरकार इसे ईज ऑफ डूइंग बिजनेस और औद्योगिक गति को बढ़ाने वाला कदम बता रही है, वहीं पर्यावरणविदों और विपक्ष का मानना है कि इससे वन क्षेत्रों और स्थानीय समुदायों के अधिकारों का उल्लंघन होने का खतरा बढ़ जाएगा।
यह नीतिगत बदलाव आने वाले समय में कानूनी चुनौतियों और सार्वजनिक विमर्श का केंद्र बना रह सकता है। प्राप्त करने की प्रक्रिया को आसान बना दिया है। नए नियमों के अनुसार, अब डेवलपर्स को पर्यावरण मंजूरी के लिए आवेदन करते समय भूमि अधिग्रहण का कानूनी प्रमाण देना अनिवार्य नहीं होगा। पहले यह एक अनिवार्य शर्त थी, जिसका अर्थ था कि जब तक जमीन का मालिकाना हक सुनिश्चित नहीं हो जाता, तब तक पर्यावरण मंजूरी की प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती थी।