ऑपरेशन सिंदूर के बाद दूसरे मौके पर भी परख हो गयी
काराकासः 3 जनवरी 2026 को वेनेजुएला में अमेरिकी सैन्य हस्तक्षेप ने न केवल दक्षिण अमेरिका, बल्कि पूरी दुनिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य को हिलाकर रख दिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में चलाए गए इस मिशन को ऑपरेशन एब्सोल्यूट रिजॉल्व नाम दिया गया, जिसके तहत अमेरिकी विशेष बलों ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोर्स को उनके निवास से हिरासत में लेकर न्यूयॉर्क पहुँचा दिया। ट्रंप प्रशासन ने इस कार्रवाई को ‘नार्को-टेररिज्म’ (मादक पदार्थ आतंकवाद) के खिलाफ एक कानूनी कदम बताया है।
इस सैन्य कार्रवाई के साथ ही राष्ट्रपति ट्रंप ने 19वीं सदी के मुनरो सिद्धांत को फिर से सक्रिय करने की घोषणा की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पश्चिमी गोलार्ध (अमेरिका और उसके पड़ोसी क्षेत्र) में बाहरी शक्तियों का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और अमेरिका इस क्षेत्र को अपना विशेष प्रभाव क्षेत्र मानता है। ट्रंप ने यहाँ तक कहा कि जब तक एक सुरक्षित और उचित सत्ता परिवर्तन नहीं हो जाता, तब तक अमेरिका वेनेजुएला को चलाएगा। यह संदेश सीधा चीन और रूस जैसी शक्तियों के लिए था, जो पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में काफी सक्रिय रही हैं।
चीनी हथियारों की विफलता और तकनीकी श्रेष्ठता सैन्य दृष्टिकोण से, इस हस्तक्षेप ने चीनी रक्षा तकनीक की साख पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। वेनेजुएला ने अपनी हवाई सुरक्षा के लिए चीन निर्मित रडार और जैसी मिसाइल प्रणालियों पर भारी निवेश किया था, जिन्हें चीन स्टील्थ हंटर (अदृश्य विमानों को पकड़ने वाला) कहकर प्रचारित करता था। हालाँकि, 3 जनवरी की रात जब अमेरिकी स्टील्थ लड़ाकू विमानों ने हमला किया, तो ये रडार उन्हें भांपने में पूरी तरह नाकाम रहे। विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक युद्ध क्षमता ने इन प्रणालियों को महंगे सजावटी सामान में बदल दिया, जिससे अमेरिकी सेना बिना किसी प्रभावी विरोध के राजधानी कराकस में दाखिल हो गई।
चीन के लिए यह केवल सैन्य अपमान नहीं, बल्कि एक बड़ा आर्थिक झटका भी है। वेनेजुएला के तेल क्षेत्र में चीन ने पिछले दो दशकों में लगभग 50 से 60 अरब डॉलर का निवेश किया है। चीन वेनेजुएला के तेल का सबसे बड़ा खरीदार रहा है, लेकिन अब ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि अमेरिकी तेल कंपनियाँ वेनेजुएला के विशाल संसाधनों पर नियंत्रण बहाल करेंगी। इससे चीन को मिलने वाले रियायती तेल की आपूर्ति रुक सकती है और उसके अरबों डॉलर के ऋण की वसूली खटाई में पड़ सकती है। यह घटनाक्रम चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के लिए इस क्षेत्र में अब तक का सबसे बड़ा जोखिम बनकर उभरा है।