पौने तीन करोड़ से अधिक वोटर हटाए गए
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एस आई आर के बाद जारी हुआ आंकड़ा
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चुनावी पारदर्शिता पर नया सवाल खड़ा
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46.23 लाख मृत वोटर भी इनमें
राष्ट्रीय खबर
नईदिल्लीः उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन के बाद जारी हुए आंकड़ों ने राज्य की राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। मंगलवार को निर्वाचन आयोग द्वारा जारी ड्राफ्ट सूची के अनुसार, देश के सबसे अधिक आबादी वाले इस राज्य की मतदाता सूची से कुल 2.89 करोड़ मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं। यह संख्या इतनी बड़ी है कि इसने पूरी चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर एक नई बहस छेड़ दी है।
विस्तृत आंकड़ों का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि हटाए गए 2.89 करोड़ नामों में से लगभग 46.23 लाख मतदाता ऐसे हैं जिनकी मृत्यु हो चुकी है। सूची को शुद्ध करने के इस अभियान में सबसे बड़ा हिस्सा उन लोगों का है जो अपने मूल स्थान से कहीं और चले गए हैं; ऐसे मतदाताओं की संख्या 2.17 करोड़ दर्ज की गई है। इसके अतिरिक्त, लगभग 25.47 लाख मतदाता ऐसे पाए गए जो एक से अधिक निर्वाचन क्षेत्रों या स्थानों पर पंजीकृत थे। आयोग की इस कार्रवाई के बाद अब उत्तर प्रदेश की अंतिम संशोधित मतदाता सूची का प्रकाशन 6 मार्च को किया जाना तय हुआ है।
प्रशासनिक स्तर पर, यह प्रक्रिया चुनौतियों से भरी रही। जब 27 अक्टूबर 2025 को इस विशेष अभियान की घोषणा हुई थी, तब उत्तर प्रदेश में कुल पंजीकृत मतदाताओं की संख्या लगभग 15.44 करोड़ थी। शुद्धिकरण के लिए प्रत्येक मतदाता के लिए व्यक्तिगत गणना फॉर्म छापे गए और बूथ स्तर के अधिकारियों को घर-घर जाकर सत्यापन और हस्ताक्षरित फॉर्म एकत्र करने की जिम्मेदारी दी गई। कुल मतदाताओं में से 12.55 करोड़ (यानी लगभग 81.03 प्रतिशत) फॉर्म ही वापस प्राप्त हुए, जबकि करीब 18.7 फीसद मतदाताओं के फॉर्म नहीं मिल सके, जिसके कारण बड़े पैमाने पर नाम हटाए गए।
क्षेत्रवार गिरावट को देखें तो उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में सबसे नाटकीय बदलाव आया है। यहाँ मतदाताओं की संख्या में 30 प्रतिशत की भारी कमी दर्ज की गई है—संशोधन से पहले लखनऊ में 39.9 लाख मतदाता थे, जो अब घटकर केवल 27.9 लाख रह गए हैं। इसी तरह ललितपुर जैसे जिलों में भी मतदाताओं की संख्या में 10 प्रतिशत तक की गिरावट देखी गई है।
इस प्रक्रिया को लेकर मचे राजनीतिक घमासान के बीच, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि इस संशोधन प्रक्रिया का उपयोग जानबूझकर कुछ विशिष्ट मतदाता समूहों को निशाना बनाने के लिए किया गया है, जिससे चुनावी संतुलन प्रभावित हो सके। हालांकि, निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि यह अभ्यास केवल लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी (तार्किक विसंगतियों) को दूर करने और फर्जी मतदान रोकने के लिए किया गया था। प्रशासनिक देरी और बीएलओ पर काम के अत्यधिक बोझ (कुछ क्षेत्रों में एक बीएलओ पर 1200 से अधिक मतदाता) के कारण इस अभियान की समय सीमा को तीन बार बढ़ाना पड़ा था, जिसके बाद यह वर्तमान ड्राफ्ट सामने आया है।