इंदौर जल प्रदूषण ने ली 15 जानें
राष्ट्रीय खबर
भोपालः मध्य प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी इंदौर से सामने आए जल प्रदूषण के मामले ने पूरे प्रशासनिक तंत्र को झकझोर कर रख दिया है। शहर के भागीरथपुरा क्षेत्र में दूषित पानी पीने से हुई कम से कम 15 मौतों के पीछे केवल तकनीकी खराबी नहीं, बल्कि नगर निगम की तीन साल लंबी आपराधिक लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता का एक काला सच छिपा है। ‘रिपब्लिक’ की खोजी जांच और नगर निगम के आंतरिक दस्तावेजों से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि निगम प्रशासन इस संभावित त्रासदी से साल 2022 से ही पूरी तरह वाकिफ था, फिर भी समय रहते कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
दस्तावेजों के अनुसार, तत्कालीन नगर आयुक्त प्रतिभा ने साल 2022 में ही एक आंतरिक नोट शीट लिखी थी, जिसमें भागीरथपुरा की जर्जर पाइपलाइन और जल प्रदूषण के गंभीर खतरे की चेतावनी दी गई थी। इस चेतावनी के बाद जनवरी 2023 में पाइपलाइन बदलने के लिए बजट भी स्वीकृत कर दिया गया था। बजट पास होने और फाइलों के आगे बढ़ने के बावजूद धरातल पर काम शुरू नहीं हुआ। आरोप है कि राजनेताओं और वरिष्ठ अधिकारियों की आपसी खींचतान और फाइलों पर हस्ताक्षर करने में की गई देरी की वजह से टेंडर की प्रक्रिया महीनों तक लटकी रही। यदि यह प्रशासनिक औपचारिकताएं समय पर पूरी हो जातीं, तो 15 निर्दोष लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
लापरवाही का आलम यह था कि जिस नर्मदा पाइपलाइन को बदलने का टेंडर 8 अगस्त को जारी किया गया था और जिसे 17 सितंबर 2025 को खोला जाना था, उसे अधिकारियों ने 100 से अधिक दिनों तक दबाए रखा। यह टेंडर अंततः 29 दिसंबर को तब खोला गया जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई और लोगों की मौतें शुरू हो गईं। प्रयोगशाला की जांच रिपोर्ट ने इस भयावहता की पुष्टि कर दी है; पानी के नमूनों में ‘फेकल कोलीफॉर्म’, ‘ई-कोली’, ‘क्लेबसिएला’ और ‘विब्रियो कोलेरा’ जैसे जानलेवा बैक्टीरिया पाए गए हैं।
फेकल कोलीफॉर्म की उपस्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि पीने के पानी की लाइन में सीवेज (मलजल) का रिसाव हो रहा था। ई-कोली और विब्रियो कोलेरा जैसे बैक्टीरिया शरीर को कुछ ही घंटों में गंभीर रूप से निर्जलित कर मौत के घाट उतार सकते हैं, जो विशेषकर बच्चों और बुजुर्गों के लिए अत्यंत घातक साबित हुए। इस पूरी घटना ने न केवल स्वच्छता के क्षेत्र में अग्रणी माने जाने वाले इंदौर की छवि को नुकसान पहुँचाया है, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया है कि फाइलों में दबी हुई योजनाएं और अधिकारियों की सुस्ती किस प्रकार आम नागरिकों के लिए मौत का पैगाम बन सकती हैं।