दिहाड़ी मजदूरों और कुलियों की आर्थिक संकट
क्वेटा/पेशावर: पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में स्थित तोरखम सीमा की निरंतर बंदी ने स्थानीय अर्थव्यवस्था और वहां रहने वाले हजारों परिवारों की कमर तोड़ दी है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच व्यापारिक गतिविधियों का मुख्य केंद्र मानी जाने वाली यह सीमा फिलहाल सुरक्षा कारणों और आतंकवाद संबंधी चिंताओं के चलते बंद है। इस बंदी का सबसे घातक प्रहार उन दिहाड़ी मजदूरों और कुलियों पर पड़ा है, जिनका जीवन पूरी तरह सीमा पार होने वाले माल की आवाजाही पर निर्भर था।
सीमा बंद होने के कारण हजारों लोगों की नौकरियां रातों-रात चली गई हैं। आर्थिक तंगी का आलम यह है कि जो मजदूर कल तक अपने दम पर घर चला रहे थे, वे आज दाने-दाने को मोहताज हैं। इस संकट का सीधा असर अगली पीढ़ी पर दिख रहा है। पैसों के अभाव में मजदूरों ने अपने बच्चों को स्कूल से निकाल लिया है। शिक्षा का अधिकार अब उनकी प्राथमिकता नहीं, बल्कि दो वक्त की रोटी का इंतजाम करना बड़ी चुनौती बन गई है। कर्ज का बोझ इतना बढ़ गया है कि कई परिवार गहरे कर्ज के जाल में फंस चुके हैं।
बेरोजगारी और भविष्य की अनिश्चितता ने स्थानीय युवाओं में मानसिक तनाव और हताशा पैदा कर दी है। रिपोर्ट के अनुसार, कई युवा इस मानसिक दबाव को न झेल पाने के कारण नशीली दवाओं की चपेट में आ रहे हैं। 24 वर्षीय मंसूर अली जैसे होनहार छात्रों को, जिन्हें कभी बेहतर भविष्य की उम्मीद थी, अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी है।
सबसे गंभीर चेतावनी मजदूर संघों की ओर से आई है। उनका कहना है कि बेरोजगार युवाओं का यह गुस्सा और हताशा एक टाइम बम की तरह है, जिसका फायदा चरमपंथी समूह उठा सकते हैं। रोजगार के अभाव में ये युवा आसानी से असामाजिक तत्वों के बहकावे में आ सकते हैं, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक नई चुनौती बन सकता है।
इतने बड़े मानवीय और आर्थिक संकट के बावजूद, सरकारी अधिकारियों और प्रांतीय सरकार का रवैया बेहद उदासीन बना हुआ है। मजदूरों की समस्याओं को सुनने या उन्हें वैकल्पिक रोजगार प्रदान करने के लिए अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं। प्रशासन की इस बेरुखी ने स्थानीय जनता में भारी असंतोष और आक्रोश पैदा कर दिया है।