बाहुबलि के बाद अंतरिक्ष क्षेत्र में भारत
इसरो द्वारा अंतरिक्ष में भेजा गया सबसे भारी उपग्रह अब सफलतापूर्वक अपने काम करने लगा है। जिस अंतरिक्ष यान से इसे भेजा गया था, उसे प्यार से बाहुबलि का नाम इसलिए दिया गया क्योंकि इससे पहले किसी दूसरे यान ने इतने भारी पे लोड को लेकर अंतरिक्ष में जाने का खतरा नहीं उठाया था। संभावित टक्कर से बचने के लिए इस यान का प्रक्षेपण नब्बे सेकंड पीछे कर दिया गया था।
लिहाजा भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम आज एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ वह केवल उपग्रह प्रक्षेपण तक सीमित न रहकर एक महाशक्ति के रूप में उभर रहा है। चंद्रयान-3 की चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर ऐतिहासिक लैंडिंग और सूर्य मिशन आदित्य-एल 1 की सफलता ने न केवल दुनिया को भारत की तकनीकी क्षमता का लोहा मनवाया है, बल्कि भारतीय अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के लिए असीमित संभावनाओं के द्वार भी खोल दिए हैं।
अब भारत का लक्ष्य केवल अंतरिक्ष में पहुँचना नहीं, बल्कि वर्ष 2033 तक अपनी अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था को 44 बिलियन डॉलर तक पहुँचाना और 2047 तक विकसित भारत के संकल्प को सिद्ध करना है। भारत की अंतरिक्ष यात्रा में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की भूमिका एक आधारशिला रही है। चंद्रयान-3 की सफलता ने भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा कर दिया है जिनके पास जटिल चंद्र मिशनों को अंजाम देने की क्षमता है।
भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के अनुसार, ये मिशन केवल वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं हैं, बल्कि वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में भारत की साख को मजबूत करने वाले मील के पत्थर हैं। वर्तमान में, भारत गगनयान कार्यक्रम के माध्यम से अपने पहले मानव अंतरिक्ष मिशन की तैयारी कर रहा है। यह मिशन भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह गहरे अंतरिक्ष अन्वेषण की दिशा में हमारा पहला बड़ा कदम होगा। इसके साथ ही, भारत ने 2040 तक चंद्रमा पर अपनी स्थायी उपस्थिति और भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है।
भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में सबसे बड़ा बदलाव इन-स्पेस के गठन के साथ आया है। यह संस्थान निजी कंपनियों के लिए नियामक और उत्प्रेरक के रूप में कार्य कर रहा है। अब अंतरिक्ष केवल इसरो की जिम्मेदारी नहीं रह गया है, बल्कि स्काईरूट और पिक्सेल जैसे स्टार्टअप्स प्रक्षेपण यान और उपग्रह सेवाओं में क्रांति ला रहे हैं। निजी क्षेत्र की भागीदारी से न केवल लागत में कमी आएगी, बल्कि नवाचार की गति भी तेज होगी। सरकार का लक्ष्य वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था के एक बड़े हिस्से पर कब्जा करना है, जिससे रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे। अंतरिक्ष तकनीक का प्रभाव केवल प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं है।
यह सीधे तौर पर आम नागरिकों के जीवन को सशक्त बना रही है। गति शक्ति जैसी योजनाओं के माध्यम से रसद में सुधार, सटीक मौसम पूर्वानुमान, आपदा प्रबंधन और कृषि क्षेत्र में उपग्रह डेटा का उपयोग शासन को अधिक पारदर्शी और प्रभावी बना रहा है। दूरदराज के क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी और शिक्षा पहुँचाने में भी अंतरिक्ष संचार की भूमिका अपरिहार्य हो गई है।
इतनी बड़ी महत्वाकांक्षाओं के साथ चुनौतियां भी उतनी ही बड़ी हैं। सबसे प्रमुख चुनौती राष्ट्रीय अंतरिक्ष कानून का अभाव है। यद्यपि स्पेस एक्टिविटीज बिल पर चर्चा हो रही है, लेकिन निजी निवेश को सुरक्षा देने के लिए पश्चिमी देशों की तर्ज पर एक स्पष्ट कानूनी ढांचे की आवश्यकता है। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स के विशेषज्ञों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय समझौतों जैसे आर्टेमिस एकॉर्ड्स के बीच भारत को अपनी संप्रभुता और हितों की रक्षा के लिए मजबूत अंतरिक्ष कूटनीति की आवश्यकता होगी।
दूसरी बड़ी चुनौती प्रतिभाओं को रोके रखना और आयात पर निर्भरता कम करना है। भारत को अपनी स्वदेशी तकनीक को इस स्तर तक ले जाना होगा कि हम संवेदनशील उपकरणों के लिए विदेशों पर निर्भर न रहें। साथ ही, अंतरिक्ष विवादों के निपटारे के लिए स्पेस डिस्प्यूट ट्रिब्यूनल जैसे निकायों का त्वरित कार्यान्वयन अनिवार्य है ताकि निवेशकों का भरोसा बना रहे।
भारत का अंतरिक्ष भविष्य तीन स्तंभों पर टिका है: स्पष्ट नीतियां, निजी निवेश और अंतरराष्ट्रीय सहयोग। जापान और यूरोपीय संघ जैसे वैश्विक साझेदार भारत के साथ काम करने को उत्सुक हैं। भारत के लिए यह सही समय है कि वह अपनी तकनीकी दक्षता को कूटनीतिक प्रभाव में बदले। अंतरिक्ष अन्वेषण अब केवल प्रतिष्ठा का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक विकास का अनिवार्य अंग बन चुका है। इसरो की मजबूत नींव और निजी क्षेत्र के उत्साह के साथ, भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक ग्लोबल हब बनने की दिशा में अग्रसर है। यदि हम अपनी नियामक बाधाओं को दूर कर लेते हैं और नवाचार को प्रोत्साहित करते हैं, तो अंतरिक्ष अनुसंधान वास्तव में भारत के विकसित राष्ट्र बनने के सपने का सबसे बड़ा उत्प्रेरक साबित होगा। अनंत ब्रह्मांड में भारत की यह लंबी छलांग अब रुकने वाली नहीं है।