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भारत का मानसिक स्वास्थ्य अब गंभीर चिंता का विषय

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, जहाँ सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन अत्यंत तीव्र गति से हो रहे हैं, नागरिकों का मानसिक स्वास्थ्य अब हाशिए का विषय नहीं रह गया है। हाल ही में भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण-2 (एनएमएचएस-2) की शुरुआत करना इस दिशा में एक मील का पत्थर है।

लगभग नौ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद, बेंगलुरु स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरो साइंसेज (निमहांस) के नेतृत्व में शुरू हुआ यह सर्वेक्षण केवल एक सांख्यिकीय अभ्यास नहीं है, बल्कि यह भारत के स्टेट ऑफ माइंड को समझने की एक गहरी कोशिश है। एनएमएचएस-1 (2015-16) ने पहली बार यह स्पष्ट किया था कि भारत में मानसिक रोगों का बोझ हमारी सोच से कहीं अधिक है।

एनएमएचएस-2 उसी शोध को आधार बनाकर अब अधिक व्यापक और समावेशी दृष्टिकोण अपना रहा है। इस बार का सर्वेक्षण न केवल वयस्कों, बल्कि 13 से 17 वर्ष के किशोरों पर भी केंद्रित है। यह आयु वर्ग इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वैश्विक स्तर पर अधिकांश मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं किशोरावस्था से ही पनपनी शुरू होती हैं।

इस सर्वेक्षण की सबसे बड़ी विशेषता इसका आधुनिक दृष्टिकोण है। पहली बार, शोधकर्ता जलवायु परिवर्तन और विस्थापन जैसे कारकों का मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन कर रहे हैं। जिस तरह से अनियमित मौसम चक्र और प्राकृतिक आपदाएं लोगों की आजीविका छीन रही हैं, उसका सीधा असर उनके मानसिक संतुलन पर पड़ रहा है।

यह अध्ययन नीति निर्माताओं को यह समझने में मदद करेगा कि कैसे पर्यावरणीय संकट भविष्य में एक मनोवैज्ञानिक संकट बन सकता है। आंकड़ों की दृष्टि से भारत की स्थिति चिंताजनक है। पूर्ववर्ती सर्वेक्षणों के अनुसार, भारत की लगभग 10.6 प्रतिशत वयस्क आबादी किसी न किसी मानसिक विकार से जूझ रही है। इसमें चिंता, अवसाद और गंभीर मनोविकार शामिल हैं।

हालांकि, चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इनमें से 70 प्रतिशत से 92 प्रतिशत लोगों को कभी कोई औपचारिक डॉक्टरी सहायता नहीं मिल पाती। इस विशाल खाई को ट्रीटमेंट गैप कहा जाता है। इस गैप के पीछे सबसे बड़ा कारण बुनियादी ढांचे और विशेषज्ञों की कमी है। इंडियन जर्नल ऑफ साइकियाट्री के अनुसार, भारत में प्रति 1 लाख आबादी पर केवल 0.75 मनोचिकित्सक उपलब्ध हैं।

यदि हम विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों को देखें, तो यह संख्या कम से कम 3 होनी चाहिए। विशेषज्ञों का यह अभाव ग्रामीण भारत में और भी भयावह है, क्योंकि अधिकांश कुशल चिकित्सक और थेरेपी केंद्र मेट्रो शहरों तक ही सीमित हैं। इसके अलावा, मानसिक स्वास्थ्य उपचार की उच्च लागत इसे आम आदमी की पहुंच से दूर कर देती है।

चिकित्सीय सुविधाओं की कमी के साथ-साथ सामाजिक कलंक एक बड़ी दीवार बनकर खड़ा है। आज भी हमारे समाज में मानसिक बीमारी को चरित्र की कमजोरी या पागलपन से जोड़कर देखा जाता है। जागरूकता के अभाव में लोग मनोचिकित्सक के पास जाने के बजाय तांत्रिकों या नीम-हकीमों का सहारा लेते हैं।

यह स्थिति न केवल बीमारी को बढ़ाती है, बल्कि समय पर मिलने वाले इलाज की संभावना को भी खत्म कर देती है। एक अन्य महत्वपूर्ण चुनौती स्वास्थ्य रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण का न होना है। शारीरिक बीमारियों की तुलना में मानसिक रोगों का उपचार लंबा चलता है। यदि मरीज का पिछला रिकॉर्ड डिजिटल रूप में उपलब्ध न हो, तो इलाज की निरंतरता बाधित होती है, जिससे सुधार की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है।

एनएमएचएस-2 की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जाएगी कि उसने कितनी सटीक रिपोर्ट तैयार की, बल्कि इस बात से तय होगी कि सरकार उन आंकड़ों का उपयोग नीतिगत स्तर पर कैसे करती है। भारत को अब अपनी रणनीतियों में मौलिक बदलाव की जरूरत है। हमें केवल बड़े अस्पतालों पर निर्भर रहने के बजाय सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को मजबूत करना होगा।

आशा कार्यकर्ताओं और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के डॉक्टरों को बुनियादी मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए ताकि वे शुरुआती लक्षणों की पहचान कर सकें। टेली-मानस जैसी हेल्पलाइन और डिजिटल थेरेपी प्लेटफॉर्म को दूरदराज के गांवों तक पहुंचाना होगा, जहाँ विशेषज्ञ भौतिक रूप से नहीं पहुंच सकते।

स्कूलों और कार्यस्थलों पर मानसिक स्वास्थ्य साक्षरता को अनिवार्य बनाना होगा। जब तक हम मानसिक स्वास्थ्य पर खुलकर बात नहीं करेंगे, तब तक सामाजिक कलंक को मिटाया नहीं जा सकेगा। स्वास्थ्य बजट में मानसिक स्वास्थ्य के लिए आवंटित राशि में उल्लेखनीय वृद्धि की आवश्यकता है ताकि सेवाओं को सस्ता और सुलभ बनाया जा सके।

अंततः, एनएमएचएस-2 को महज एक डायग्नोस्टिक एक्सरसाइज या फाइलों में सिमटने वाली रिपोर्ट बनकर नहीं रह जाना चाहिए। यह भारत के लिए अपनी स्वास्थ्य प्राथमिकताओं को फिर से परिभाषित करने का अवसर है। एक स्वस्थ राष्ट्र वही होता है जिसका मस्तिष्क भी उतना ही स्वस्थ हो जितना उसका शरीर।