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दिल्ली हाईकोर्ट में कुलदीप सिंह सेंगर की जमानत मंजूर

जघन्य बलात्कार में दोषी ठहराये गये भाजपा विधायक को राहत

  • उन्नाव कांड लोगों को अब भी याद है

  • पीड़िता के पिता की हत्या हुई थी

  • जमानत में कुछ शर्ते भी लागू

राष्ट्रीय खबर

नई दिल्ली: दिल्ली उच्च न्यायालय ने मंगलवार को एक बड़ा फैसला सुनाते हुए उन्नाव बलात्कार मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे निष्कासित भाजपा नेता कुलदीप सिंह सेंगर की जेल की सजा को निलंबित कर दिया है। न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद और न्यायमूर्ति हरिश वैयनाथन शंकर की खंडपीठ ने सेंगर को नियमित जमानत पर रिहा करने का आदेश जारी किया। यह आदेश उस समय आया है जब सेंगर निचली अदालत द्वारा 2019 में सुनाई गई सजा के खिलाफ उच्च न्यायालय में अपनी अपील के लंबित रहने के दौरान जेल में बंद थे।

जमानत की सख्त शर्तें और वित्तीय मुचलका अदालत ने सेंगर को राहत देते हुए उनकी रिहाई के लिए कड़ी शर्तें निर्धारित की हैं। उन्हें 15 लाख रुपये का व्यक्तिगत मुचलका और इतनी ही राशि की तीन जमानती पेश करने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने सुरक्षात्मक उपाय अपनाते हुए स्पष्ट आदेश दिया है कि जमानत अवधि के दौरान सेंगर पीड़िता के घर के 5 किलोमीटर के दायरे में कदम नहीं रखेंगे। साथ ही, उन्हें पूरी जमानत अवधि के दौरान दिल्ली की भौगोलिक सीमा के भीतर ही रहना होगा और वह पीड़िता या उसकी मां को किसी भी तरह से डराने या प्रभावित करने का प्रयास नहीं करेंगे।

न्यायिक चेतावनी और अपील की स्थिति पीठ ने अपनी टिप्पणी में बहुत स्पष्ट किया है कि यदि सेंगर द्वारा अदालत द्वारा निर्धारित किसी भी शर्त का उल्लंघन किया जाता है, तो उनकी जमानत तत्काल प्रभाव से रद्द कर दी जाएगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह सजा केवल तब तक निलंबित की गई है जब तक कि हाईकोर्ट दिसंबर 2019 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली सेंगर की अपील पर अंतिम फैसला नहीं सुना देता। ट्रायल कोर्ट ने उन्हें अपहरण और बलात्कार का दोषी पाया था।

एक लंबा कानूनी सफर यह मामला साल 2017 में उत्तर प्रदेश के उन्नाव में एक नाबालिग लड़की के साथ हुए अपहरण और बलात्कार से जुड़ा है। मामले की गंभीरता और पीड़िता की सुरक्षा को देखते हुए, उच्चतम न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद 1 अगस्त, 2019 को मुकदमे को उत्तर प्रदेश से दिल्ली स्थानांतरित किया गया था। कुलदीप सिंह सेंगर पर एक अन्य संबंधित मामला भी चल रहा है, जो पीड़िता के पिता की पुलिस हिरासत में हुई मौत से जुड़ा है। उस मामले में उन्हें 10 साल की सजा सुनाई गई थी, और उस सजा के निलंबन की अपील भी वर्तमान में उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है। यह फैसला इस लंबे और संवेदनशील कानूनी विवाद में एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है।