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CM ने किया ऐलान, इस मेडिकल कॉलेज का नाम हिन्द की चादर श्री गुरु तेग बहादुर जी के नाम पर रखा

चंडीगढ: श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी समागम के अवसर पर गुरुद्वारा साहिब गोबिंदपुरा, भम्भौली में मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की तथा श्री गुरु तेग बहादुर जी को श्रद्धा सुमन अर्पित किए।

मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि आज इस पवित्र धरा पर आप सबके बीच में आकर मेरा मन श्रद्धा और गौरव से भर गया है। आज हम यहां उस महान विरासत को नमन करने आए हैं, जिसने न केवल भारत की अस्मिता को बचाया, बल्कि मानवता को धर्म और सत्य के लिए सर्वस्व अर्पण करने का मार्ग दिखाया।

आज का यह शहीदी समागम श्री गुरु तेग बहादुर जी की 350वीं शहीदी शताब्दी तथा माता गुजर कौर जी और चारों साहिबजादों की महान शहादत को समर्पित है। उन्होंने कहा कि समागम में पंथ के महान कीर्ति जत्थे और विद्वान कथा वाचको द्वारा जो गुरुवाणी का प्रवाह यहां हो रहा है, उससे हमारी साध संगत तो निहाल होगी ही, साथ ही हमारी युवा पीढ़ी भी गुरु साहिबान और वीर साहिबजादों की शहादत से प्रेरित होगी। मुख्यमंत्री ने गुरुद्वारा ट्रस्ट को 31 लाख रुपये देने की घोषणा की। गुरुद्वारा ट्रस्ट द्वारा मुख्यमंत्री को सरोपा, श्री गुरु तेग बहादुर जी का चित्र व तलवार भेंट कर सम्मानित किया गया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि आज के इस समागम में बड़े रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया है। यह गुरु साहिब की उस शिक्षा का ही विस्तार है, जिसमें कहा गया है कि मानवता की सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है। उन्होंने रक्तदान के लिए उमड़े युवाओं की सराहना की। उन्होंने कहा कि आपका दिया हुआ रक्त किसी का जीवन बचा सकता है। साथ ही, इस समागम के आयोजन के लिए बाबा जसदीप सिंह व आयोजकों का हार्दिक आभार प्रकट किया। उन्होंने कहा कि सरबंसदानी दशम पातशाह श्री गुरु गोबिन्द सिंह जी के परिवार की शहादत को दुनिया के इतिहास की सबसे बड़ी शहादत माना जाता है। केवल 6 और 9 वर्ष की छोटी सी आयु में शहादत देने वाले उनके वीर बेटों बाबा जोरावर सिंह जी और बाबा फतेह सिंह जी को जब भी याद किया जाता है, तो हर किसी की जुबान से निक्किया जिंदा वड्डा साका शब्द निकलते हैं।

उन्होंने कहा कि दुनिया के इतिहास में ऐसी कोई मिसाल नहीं मिलती, जहां मासूम बच्चों ने धर्म की रक्षा के लिए दीवारों में जिंदा चिनवाना स्वीकार कर लिया  लेकिन झुकना स्वीकार न किया हो। उनके परिवार के सभी सदस्यों ने धर्म व आम जन की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। यह कुर्बानी  इतिहास के पन्नों पर सदैव अंकित रहेगी। उन्होंने कहा कि यह शहादत हमें सिखाती है कि वीरता उम्र की मोहताज नहीं होती। माता गुजर कौर जी ने जिस तरह जेल की ठंडी बुर्जियों में रहकर भी अपने पोतों को धर्म पर अडिग रहने की शिक्षा दी, वह आज की माताओं और बहनों के लिए भी प्रेरणा का सबसे बड़ा स्रोत है।