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आर्थिक बदहाली के दौर से जूझते देश को विश्व बैंक की मदद

पाकिस्तान को सत्तर करोड़ डॉलर का कर्ज दिया

इस्लामाबादः लंबे समय से गंभीर आर्थिक मंदी, आसमान छूती महंगाई और विदेशी मुद्रा भंडार की भारी कमी से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय गलियारों से एक संजीवनी भरी खबर आई है। विश्व बैंक ने पाकिस्तान के महत्वाकांक्षी आर्थिक सुधार कार्यक्रमों के लिए 70 करोड़ डॉलर (लगभग 195 अरब पाकिस्तानी रुपये) की वित्तीय सहायता राशि को आधिकारिक मंजूरी दे दी है।

यह फंड ऐसे समय में आया है जब पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार अपने निचले स्तर पर पहुँच गया है और देश पर डिफॉल्ट (दिवालिया) होने का खतरा मंडरा रहा था। विशेषज्ञों का मानना है कि यह राशि पाकिस्तान की डगमगाती अर्थव्यवस्था के लिए एक लाइफलाइन की तरह काम करेगी, जिससे उसे अपनी अंतरराष्ट्रीय देनदारियों को पूरा करने में कुछ समय मिल जाएगा।

विश्व बैंक के अनुसार, इस फंड का उपयोग तीन मुख्य क्षेत्रों में किया जाना है: पहला, देश की कर प्रणाली में सुधार करना ताकि सरकारी राजस्व में वृद्धि हो सके; दूसरा, ऊर्जा क्षेत्र की कार्यक्षमता को बढ़ाना जो वर्तमान में भारी घाटे और सर्कुलर डेट से जूझ रहा है; और तीसरा, सामाजिक सुरक्षा जाल को मजबूत करना ताकि गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले नागरिकों को महंगाई के दौर में सहायता मिल सके।

हालाँकि, यह वित्तीय सहायता बिना किसी चुनौती के नहीं आई है। विश्व बैंक ने इस कर्ज के साथ कुछ बेहद कड़ी और अलोकप्रिय शर्तें भी जोड़ी हैं। बैंक ने पाकिस्तान सरकार से दो टूक शब्दों में कहा है कि उसे बिजली और गैस की दरों में भारी वृद्धि करनी होगी और सरकारी खर्चों में कठोर कटौती लागू करनी होगी। इन शर्तों को लागू करने का सीधा मतलब है कि पाकिस्तान की आम जनता पर महंगाई का बोझ और बढ़ेगा, जो पहले से ही 30 प्रतिशत से अधिक की मुद्रास्फीति दर का सामना कर रही है।

आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि 70 करोड़ डॉलर की यह राशि तात्कालिक संकट को टालने और विदेशी मुद्रा भंडार को सहारा देने के लिए तो ठीक है, लेकिन यह कोई स्थायी समाधान नहीं है। पाकिस्तान को अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए अपनी निर्यात नीतियों में आमूल-चूल परिवर्तन करना होगा और बाहरी कर्ज पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी।

मौजूदा शहबाज शरीफ सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक अस्थिरता और भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच अंतरराष्ट्रीय दाताओं का भरोसा बनाए रखना है। यदि सरकार इन सुधारों को समयबद्ध तरीके से लागू करने में विफल रहती है, तो भविष्य में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक से अगली किश्तें मिलना लगभग असंभव हो जाएगा।