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पाकिस्तान में कंडोम संकट दवाइयां भी महंगी

महंगाई और आईएमएफ की शर्तों से जूझ रहा है यह देश

इस्लामाबादः आर्थिक बदहाली से जूझ रहे पाकिस्तान में एक विचित्र लेकिन गंभीर संकट पैदा हो गया है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) से बेलआउट पैकेज हासिल करने के लिए लगाई गई कड़ी शर्तों के कारण पाकिस्तान सरकार ने स्वास्थ्य संबंधी कई उत्पादों पर भारी टैक्स लगा दिया है, जिसमें गर्भनिरोधक और कंडोम भी शामिल हैं। इसके चलते बाजार में इन उत्पादों की कीमतों में भारी उछाल आया है, जिसे अब आम नागरिक कंडोम संकट कह रहे हैं।

पाकिस्तान वर्तमान में अपने इतिहास के सबसे बुरे आर्थिक दौर से गुजर रहा है। विदेशी मुद्रा भंडार की कमी और बढ़ते कर्ज के बोझ ने सरकार को आईएमएफ की हर कठोर शर्त मानने पर मजबूर कर दिया है। राजस्व संग्रह बढ़ाने के नाम पर जीवन रक्षक दवाओं और स्वास्थ्य देखभाल उत्पादों पर 18 से 25 फीसद तक जीएसटी लगा दिया गया है।

कंडोम, जो पहले से ही सामाजिक वर्जनाओं के कारण एक कठिन उत्पाद था, अब आम आदमी की पहुंच से बाहर होता जा रहा है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि कंडोम की कीमतों में 200 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है, जिससे निम्न और मध्यम आय वर्ग के परिवारों के लिए परिवार नियोजन अब एक विलासिता बन गया है।

पाकिस्तान की जनसंख्या वृद्धि दर (लगभग 2.5 फीसद) पहले से ही दक्षिण एशिया में सबसे अधिक है। विशेषज्ञों का मानना है कि कंडोम की कीमतों में वृद्धि से न केवल अनचाहे गर्भधारण के मामलों में वृद्धि होगी, बल्कि यह देश के पहले से ही कमजोर परिवार नियोजन कार्यक्रम को दशकों पीछे धकेल देगा। इसके अलावा, एक बड़ा खतरा एड्स और अन्य यौन संचारित रोगों के फैलने का है। पाकिस्तान में पहले से ही एचआईवी के मामलों में वृद्धि देखी जा रही है, और सुरक्षात्मक उपायों के महंगे होने से यह स्थिति एक सार्वजनिक स्वास्थ्य आपातकाल का रूप ले सकती है।

पाकिस्तान सरकार ने आईएमएफ से इन आवश्यक वस्तुओं पर टैक्स हटाने की मानवीय अपील की थी, लेकिन वैश्विक संस्था ने अपने राजस्व लक्ष्य को सर्वोपरि रखते हुए इस मांग को खारिज कर दिया है। यह स्थिति दिखाती है कि कैसे वैश्विक आर्थिक नीतियां किसी देश के बुनियादी सामाजिक और स्वास्थ्य ढांचे को तहस-नहस कर सकती हैं। कराची, लाहौर और इस्लामाबाद जैसे बड़े शहरों में सामाजिक कार्यकर्ता और नागरिक अब सड़कों पर उतर आए हैं। उनका कहना है कि सरकार और आईएमएफ को वित्तीय आंकड़ों से हटकर मानवीय जीवन और भविष्य की पीढ़ी पर पड़ने वाले इसके विनाशकारी प्रभावों को देखना चाहिए।