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अमेरिकी रक्षा बजट भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी

कई युद्ध तकनीकों को भारत स्थानांतरित करने तक का फैसला

वाशिंगटनः अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा दिसंबर 2025 में हस्ताक्षरित राष्ट्रीय रक्षा प्राधिकरण अधिनियम 2026 न केवल अमेरिका के लिए, बल्कि भारत और हिंद-प्रशांत क्षेत्र की सुरक्षा के लिए एक युगांतरकारी कदम है। यह 900 बिलियन डॉलर से अधिक का बजट है, जो इसे इतिहास का सबसे बड़ा रक्षा बजट बनाता है।

इस बजट की सबसे बड़ी विशेषता भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी को प्रमुख रक्षा भागीदार  के स्तर से भी ऊपर ले जाना है। बजट दस्तावेजों के अनुसार, अमेरिका अब भारत के साथ जेट इंजन तकनीक के पूर्ण हस्तांतरण और सह-उत्पादन की प्रक्रिया में तेजी लाएगा। यह पहली बार है जब अमेरिका किसी गैर-नाटो सहयोगी के साथ अपनी इतनी उन्नत सैन्य तकनीक साझा कर रहा है। इसके साथ ही, प्रीडेटर ड्रोन और स्ट्राइकर बख्तरबंद वाहनों के साझा निर्माण के लिए भी विशेष बजटीय प्रावधान किए गए हैं। यह पहल भारत को रूस पर अपनी सैन्य निर्भरता कम करने और आत्मनिर्भर भारत अभियान को वैश्विक पहचान दिलाने में मदद करेगी।

बजट में क्वाड (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) के ढांचे के भीतर समुद्री सुरक्षा सहयोग के लिए 4.5 बिलियन से अधिक का फंड आवंटित किया गया है। इसका उद्देश्य दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर में चीन की विस्तारवादी नीतियों को नियंत्रित करना है। बजट में ताइवान की सुरक्षा के लिए ताइवान सिक्योरिटी कोऑपरेशन इनिशिएटिव के तहत 1 बिलियन की सीधी सैन्य सहायता का प्रावधान है। इसके अतिरिक्त, फिलीपींस जैसे सहयोगियों के लिए भी 1.5 बिलियन की सुरक्षा सहायता राशि तय की गई है। यह स्पष्ट करता है कि अमेरिका हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक स्वतंत्र और खुला वातावरण सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।

बजट में न केवल पारंपरिक हथियारों, बल्कि भविष्य की तकनीकों जैसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, हाइपरसोनिक मिसाइलों और अंतरिक्ष रक्षा पर 146 बिलियन डॉलर का निवेश करने का निर्णय लिया गया है। भारत के साथ रक्षा नवाचार पुल को मजबूत करने के लिए अतिरिक्त कोष की व्यवस्था की गई है, जिससे दोनों देशों के स्टार्टअप्स मिलकर नई रक्षा तकनीकें विकसित कर सकें। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह बजट दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को भारत के पक्ष में झुकाने और वैश्विक स्तर पर चीन को एक कड़ा सामरिक जवाब देने की दिशा में सबसे बड़ा वित्तीय प्रहार है।