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कॉरपोरेट संस्कृति से संचालित होता ट्रंप का देश

एक समय था जब तीसरी दुनिया के प्रतिभाशाली और महत्वाकांक्षी लोगों के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका एक सपनों का ठिकाना हुआ करता था। ये लोग, अपनी विशेषज्ञता और मेहनत के बल पर, अमेरिकी विकास गाथा का अभिन्न अंग बने। चाहे वह विज्ञान हो, प्रौद्योगिकी हो, चिकित्सा हो, या शिक्षा, इन अप्रवासियों ने अमेरिका की प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

उन्हें अमेरिकी अर्थव्यवस्था और समाज के लिए एक आवश्यक टैलेंट पूल के रूप में देखा जाता था। लेकिन, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के नए और कठोर नीतिगत बदलावों के बाद, यह प्रश्न उभर आया है कि क्या अमेरिकी सरकार अब इस ऐतिहासिक जिम्मेदारी से पीछे हट जाएगी?

क्या यह बदलाव उन लाखों भारतीयों के लिए, जो अमेरिकी नागरिक बनने या वहाँ स्थायी रूप से बसने का सपना देखते हैं, एक स्थायी बाधा बन जाएगा? डोनाल्ड ट्रंप का यह नया फतवा, जिसमें उन्होंने तीसरी दुनिया के देशों के नागरिकों के लिए अमेरिका के दरवाज़े पूरी तरह बंद करने का एलान किया है, इस बहस को और भी महत्वपूर्ण बना देता है।

व्हाइट हाउस का नया रुख स्पष्ट है: वे अब उन नागरिकों की आदत को बर्दाश्त नहीं करेंगे जो पहले अपने देश में काम ढूंढने की कोशिश किए बिना सीधे अमेरिका जाकर बसना चाहते हैं। यह नीति केवल नए आवेदकों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उन लोगों को भी संदेह के घेरे में लाती है जो पहले ही अमेरिका के स्थायी नागरिक बन चुके हैं।

ट्रंप का यह रुख कोई नया आश्चर्य नहीं है; बल्कि यह उनकी राजनीतिक विचारधारा का मूल स्तंभ रहा है। उन्होंने दूसरी बार राष्ट्रपति चुनाव मुख्य रूप से अवैध अप्रवासियों को निकालने और सीमा सुरक्षा को कड़ा करने के नारे के साथ जीता था। चुनाव जीतने के बाद से ही उन्होंने अपने अप्रवासी विरोधी एजेंडे को सक्रिय रूप से आगे बढ़ाया है, जिससे अमेरिका में रहने वाले आप्रवासी समुदायों के बीच एक गहरी नाराजगी और अनिश्चितता का माहौल पैदा हुआ है।

इस राजनीतिक माहौल का एक दिलचस्प पहलू न्यूयॉर्क मेयर का चुनाव था, जिसे भारतीय मूल के ज़ोहराब ममदानी ने अप्रवासी संकट को प्रमुख मुद्दा बनाकर भारी अंतर से जीता। यह जीत दर्शाती है कि अप्रवासी समुदाय न केवल एक बड़ी आबादी है, बल्कि अमेरिका की राजनीतिक प्रक्रिया में एक शक्तिशाली और मुखर भागीदार भी है।

ममदानी की जीत के कुछ ही दिन बाद, व्हाइट हाउस के करीब एक अफगान युवक द्वारा नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी की एक गोरी महिला कर्मचारी की हत्या की दुखद घटना ने ट्रंप को एक बार फिर कठोर रुख अपनाने का मौका दिया। ट्रंप के नए एलान का सबसे गहरा और प्रत्यक्ष असर भारतीय युवाओं पर पड़ रहा है।

भारत, जो दुनिया में सबसे ज़्यादा प्रतिभा और कुशल कार्यबल का निर्यात करता है, वहाँ के लाखों युवा अमेरिकी शिक्षा, रोज़गार और नागरिकता को अपनी जीवन की अंतिम मंज़िल मानते हैं। सूचना प्रौद्योगिकी और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में भारतीय पेशेवर अमेरिकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ रहे हैं। एच-1बी वीज़ा कार्यक्रम, जिसका उपयोग मुख्य रूप से कुशल भारतीय पेशेवरों को अमेरिका लाने के लिए किया जाता है, पहले से ही कड़े प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। ट्रंप की नई नीति अब इस सपने पर लगभग पूर्ण विराम लगाने की धमकी दे रही है।

ट्रंप ने अपने रुख को बहुत साफ़ शब्दों में ज़ाहिर किया है: उन्होंने पूछा है कि तीसरी दुनिया के देशों की बेरोज़गारी, आर्थिक और सामाजिक बदहाली के लिए अमेरिकी नागरिक क्यों ज़िम्मेदार बनें? यह तर्क आकर्षक लग सकता है, लेकिन यह एक ऐतिहासिक तथ्य को नज़रअंदाज़ करता है: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से, अमेरिका ने जानबूझकर और व्यवस्थित तरीके से तीसरी दुनिया से प्रतिभाशाली लोगों को अपने विकास कार्यों में शामिल होने के लिए आकर्षित किया है।

इन्होंने अमेरिकी खजाने को भरा और देश की तकनीकी और आर्थिक श्रेष्ठता को बनाए रखने में मदद की। ट्रंप के इस नए एलान का असर केवल अमेरिका तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसका पूरी दुनिया पर बड़ा असर पड़ेगा। ट्रंप के इस कठोर कदम से इन देशों में अप्रवासी विरोधी ताकतों को और बल मिलेगा। यह एक खतरनाक मिसाल कायम करेगा, जिससे वैश्विक स्तर पर अलगाववाद और संरक्षणवाद की भावना बढ़ेगी।

भारत के उन युवाओं के लिए जो किसी भी कीमत पर विकसित दुनिया के नागरिक बनने का सपना देखते हैं, उन्हें अब सचेत होने की आवश्यकता है। अमेरिकी नागरिकता के सपने को पूरा करने की अनिश्चितता और कठिनाई अब स्पष्ट है। ऐसे में, उनके पास एक ही वास्तविक विकल्प बचता है: अपने देश को बनाने में शामिल होना। दूसरी तरफ यह भी साफ हो जाता है कि डोनाल्ड ट्रंप बतौर एक राष्ट्राध्यक्ष भी उस कॉरपोरेट नीति के प्रभाव में हैं, जहां काम निकल जाने के बाद व्यक्ति को कूड़े के ढेर में डाल देना जायज माना जाता है।