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पसंदीदा रसोई तेल बन सकता है खतरे का कारण

अपने सेहत का खुद ही ख्याल रखना पड़ेगा आप सभी को

  • मेटाबॉलिक सिंड्रोम के विकास में कारगर

  • दो समूहों के चूहों पर इसे आजमाया गया

  • बसा के स्रोतों पर अधिक ध्यान जरूरी है

राष्ट्रीय खबर

रांचीः कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय, रिवरसाइड के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक गहन अध्ययन ने अमेरिका और दुनिया भर में सबसे अधिक उपयोग किए जाने वाले खाना पकाने के तेल में से एक, सोयाबीन तेल, के संबंध में एक महत्वपूर्ण और चिंताजनक चेतावनी जारी की है। इस अध्ययन से पता चला है कि सोयाबीन तेल का सेवन न केवल मोटापा और मधुमेह के खतरे को बढ़ाता है, बल्कि यह मेटाबॉलिक सिंड्रोम के विकास में भी एक प्रमुख कारक हो सकता है।

सोयाबीन तेल, जो अक्सर वनस्पति तेल के रूप में लेबल किया जाता है, अपनी कम लागत और बहुमुखी उपयोगिता के कारण व्यापक रूप से इस्तेमाल किया जाता है। इसे तले हुए खाद्य पदार्थों, प्रसंस्कृत स्नैक्स और यहाँ तक कि रेस्टोरेंट के व्यंजनों में भी खूब इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन शोधकर्ताओं ने पाया है कि इस तेल में मौजूद उच्च स्तर के ओमेगा-६ पॉलीअनसैचुरेटेड फैटी एसिड शरीर में सूजन को बढ़ावा दे सकते हैं और इंसुलिन प्रतिरोध को बिगाड़ सकते हैं।

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शोध के दौरान, वैज्ञानिकों ने चूहों के दो समूहों पर प्रयोग किया: एक समूह को सोयाबीन तेल युक्त आहार दिया गया, और दूसरे समूह को नारियल तेल या अन्य स्वस्थ वसा वाला आहार दिया गया। परिणाम स्पष्ट थे। जिन चूहों को सोयाबीन तेल आधारित आहार दिया गया था, उनका वजन तेजी से बढ़ा, उनमें वसा का संचय  अधिक हुआ, और उनके लिवर में क्षति के संकेत मिले।

इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि सोयाबीन तेल वाले समूह में इंसुलिन प्रतिरोध विकसित हुआ, जो टाइप 2 मधुमेह का एक प्रारंभिक चरण है, और उनमें मेटाबॉलिक सिंड्रोम के अन्य लक्षण भी दिखे। मेटाबॉलिक सिंड्रोम हृदय रोग, स्ट्रोक और मधुमेह के जोखिम को बढ़ाने वाले विकारों का एक समूह है, जिसमें उच्च रक्तचाप, उच्च रक्त शर्करा, और पेट के आसपास अत्यधिक वसा शामिल है।

अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ताओं में से एक, डॉ. पूनमजोत डियोला, ने जोर देकर कहा है कि यह शोध सोयाबीन तेल को पूरी तरह से त्यागने का आह्वान नहीं है, बल्कि इसके अत्यधिक और लगातार उपयोग के खिलाफ एक चेतावनी है। उनका सुझाव है कि उपभोक्ताओं को अपने आहार में वसा के स्रोतों के प्रति अधिक सचेत रहना चाहिए।

यह वैज्ञानिक खोज आम जनता के लिए अत्यंत उपयोगी है। यह हमें दैनिक आहार में बदलाव करने के लिए प्रेरित करती है। विकल्पों पर विचार करें: सोयाबीन तेल के बजाय, स्वस्थ माने जाने वाले तेलों जैसे जैतून का तेल, कैनोला तेल या सरसों का तेल का उपयोग सीमित मात्रा में करें। इस शोध का निष्कर्ष यही है कि स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने के लिए हमें अपने रसोई के विकल्पों पर गंभीरता से पुनर्विचार करना होगा। एक छोटी सी आदत में बदलाव भी दीर्घकालिक स्वास्थ्य लाभ दे सकता है।

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